eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 30

iq .; frfFk ( 26 Qjojh ) ij fo ' ks " k

दलित उद्ारक के रूप में वीर सावरकर

डा . विवेक आर्य

क्रां

तिकारी वीर सावरकार का सथान भारतीय सितंत्ता संग्राम में अपना ही एक विशेष महति रखता है । सावरकर जी पर लगे आरोप भी अमद्तीय थे उनहें मिली सजा भी अमद्तर थी । एक तरफ उन पर आरोप था कि अंग्रेज सरकार के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाने का , बम बनाने का और विमभन् देशों के क्रांतिकारियों से समपक्फ करने का तो दूसरी तरफ उनको सजा मिली थी पूरे 50 वर्ष तक दो सश्म आजीवन कारावास । इस सजा पर उनकी प्रतिक्रिया भी अमद्तीय थी कि ईसाई मत को मानने वाली अंग्रेज सरकार कब से पुनर्जनम अर्थात दो जनमों को मानने लगी । वीर सावरकर को 50 वर्ष की सजा देने के पीछे अंग्रेज सरकार का मंतवर था कि उनहें किसी भी प्रकार से भारत अथवा भारतीयों से दूर रखा जाये । जिससे वे क्रांति की अमनि को न भड़का सके ।
वीर सावरकर के लिए शिवाजी महाराज प्रेरणा स्ोत थे । जिस प्रकार औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को आगरे में कैद कर लिया था उसी प्रकार अंग्रेज सरकार ने भी वीर सावरकर को कैद कर लिया था । जैसे शिवाजी महाराज ने औरंगजेब की कैद से छुटिने के लिए अनेक पत् लिखे उसी प्रकार से वीर सावरकर ने भी अंग्रेज सरकार को पत् लिखे । जब उनकी अंडमान की कैद से छुटिने की योजना असफल हुई , जब उसे अनसुना कर दिया गया । तब वीर शिवाजी की तरह वीर सावरकर ने भी कूटिनीति का सहारा लिया ्रूंमक उनका मानना था अगर उनका समपूण्य जीवन इसी प्रकार अंडमान की अँधेरी
कोठरियों में निकल गया तो उनका जीवन वरथ्य ही चिला जायेगा । इसी रणनीति के तहत उनहोंने सरकार से सशर्त मु्त होने की प्रार्थना की , जिसे सरकार द्ारा मान तो लिया गया । उनहें रत्नागिरी में 1924 से 1937 तक राजनीतिक क्ेत् से दूर नज़रबंद रहना था । विरोधी लोग इसे वीर सावरकर का माफीनामा , अंग्रेज सरकार के आगे घुटिने टिेकना और देशद्रोह आदि कहकर उनकी आलोचिना करते हैं जबकि यह तो आपातकालीन धर्म अर्थात कूटिनीति थी ।
मुशसलम तुष्टिकरण को प्रोतसाहन देने के लिए सरकार ने अंडमान द्ीप के कीर्ति सतमभ से वीर
सावरकर का नाम हटिा दिया और संसद भवन में भी उनके चित्र को लगाने का विरोध किया । जीवन भर जिनहोंने अंग्रेजों की यातनाये सही , मृतरु के बाद उनका ऐसा अपमान करने का प्रयास किया गया । उनका विरोध करने वालों में कुछ दलित वर्ग की राजनीति करने वाले नेता भी थे , जिनहोंने अपनी राजनीतिक महतिाकांक्ा को पूरा करने के लिए उनका विरोध किया था । दलित वर्ग के मधर कार्य करने का वीर सावरकर का अवसर उनके रत्नागिरी प्रवास के समय मिला । 8 जनवरी 1924 को सावरकर जी रत्नागिरी में प्रविष्ट हुए तो उनहोंने घोषणा कि
30 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf ekpZ 2021