eMag_March 2021_Dalit Andolan | Seite 29

इनसान की मुक्त संभव नहीं है । अतः ऋषि दयाननद का दलितोद्धार की दृष्टि से भी सब से महान कार्य यह था कि उनहोंने सबके साथ दलितों के लिए भी वेद-विद्ा के दरवाजे खोल
दिए । मधरकाल मे सत्ी-शूद्रों के वेदाधररन पर जो प्रतिबंध लगाये गए थे । आर्य समाज के संसथापक महर्षि दयाननद ने अपने मेधावी क्रांतिकारी मचिंतन और वरश्तति से उन सब प्रतिबंधों को अवैदिक सिद्ध कर दिया । ऋषि दयाननद के दलितोद्धार के इस प्रधान साधन और उपाय में ही उनके द्ारा अपनाये गए अनर सभी उपायों का समावेश हो जाता है । जैसे- दलित सत्ी-शूद्रों को गायत्ी मंत् का उपदेश देना , उनका उपनयन संसकार करना , उनहें होम-हवन करने का अधिकार प्रदान करना , उनके साथ सहभोज करना , शैमक्क संसथाओं में शिक्ा िसत् और खान पान हेतु उनहें समान अधिकार प्रदान करना , गृहसथ जीवन में पदार्पण हेतु युवक-युवतियों के अनुसार ( अंतरजातीय ) विवाह करने की प्रेरणा देना आदि ।
डा . आंबेडकर ने भी सिीकार किया है कि सिामी दयाननद द्ारा प्रतिपादित वर्णवरिसथा बुद्धि गमर और निरूपद्रवी है । महारा्ट् के सुप्रसिद्ध ि्ता प्राचिार्य शिवाजीराव भोसले जी ने अपने एक लेख में लिखा है ,‘ राजपथ से
सुदूर दुर्गम गांव में दलित पुत् को गोदी में बिठाकर सामने बैठी हुई सुकनरा को गायत्ी मंत् पढ़ाता हुआ एकाध नागरिक आपको दिखाई देगा तो समझ लेना वह ऋषि दयाननद प्रणीत
का अनुयायी होगा । आर्यसमाजी न होते हुए भी ऋषि दयाननद की जीवनी के अधररन और अनुसंधान में 15 से भी अधिक वर्ष समर्पित करने वाले बंगाली बाबू देवेंद्रनाथ ने दयाननद की महत्ा का प्रतिपादन करते हुए लिखा है कि वेदों के अनधिकार के प्रश्न ने तो सत्ी जाति और शूद्रों को सदा के लिए विद्ा से वंमचित किया था । इसी ने धर्म के महंतों और ठेकेदारों की गमद्रां सथामपत की थीं , जिनहोंने जनता के मशसत्क पर ताले लगाकर देश को रसातल में पहुंचिा दिया था । दयाननद ने इन तालों को तोड़कर मनु्रों को मानसिक दासता से छुड़ाए ।
ऋषि दयाननद के काशी शासत्ाथ्य में उपशसथत पंडित सतरव्रत सामश्मी ने भी सप्टि रूप से सिीकार करते हुए लिखा है ,‘‘ शूद्रसर वेदाधिकारे साक्ात् वेदिचिनमपि प्रदर्शितं सिामि दयाननदेन यथेमां वाचिं इति ।” डा . चन्द्रभानु सोनवणे ने लिखा है कि मधरकाल में पौराणिकों ने वेदाधररन का अधिकार ब्ाह्मण पुरुष तक ही सीमित कर दिया था । सिामी दयाननद ने यजुिचेद के ( 26 / 2 ) मंत् के आधार पर
मानवमात् को वेद की कलराणी वाणी का अधिकार सिद्ध कर दिया । सिामीजी इस यजुिचेद मंत् के सतराथ्यद्रष्टा ऋ़षि हैं ।
ऋषि दयाननद के बलिदान के ठीक दस वर्ष बाद उनहें श्द्धांजलि देते हुए दादा साहेब खापडडे ने लिखा था कि सिामीजी ने मंदिरों में दबा छिपाकर रखे गए वेद भंडार समसत मानव मात् के लिए खोल दिए थे । उनहोंने हिंदू धर्म के वृक् को महद् योगरता से कलम करके उसे और भी अधिक फलदायक बनाया । वेदभा्र पद्द्मत को दयाननद सरसिती की देन नामक शोध प्रबंध के लेखक डा . सुधीर कुमार गुपत के अनुसार सिामी जी ने अपने वेदभा्र का हिंदी अनुवाद करवाकर वेदज्ञान को सार्वजनिक संपमत् बना दिया । पं . चिमूपति जी के शबदों में दयाननद की दृष्टि में कोई अछूत न था । उनकी दयाबल-बली भुजाओं ने उनहें असपृ्रता की गहरी गुहा से उठाया और आर्यति के पुणरमशखर पर बैठाया था ।
हिंदी के सुप्रसिद्ध छायावादी महाकवि सूर्यकांत मत्पाठी निराला ने लिखा है कि देश में महिलाओं , पतितों तथा जाति-पांति के भेदभाव को ममटिाने के लिए महर्षि दयाननद तथा आर्यससमाज से बढ़कर इस नवीन विचिारों के युग में किसी भी समाज ने कार्य नहीं किया । आज जो जागरण भारत में दीख पड़ता है , उसका प्रायः समपूण्य श्ेर आर्य समाज को है । महारा्ट् राजर संसकृमत संवर्धन मंडल के अधरक् मराठी वि्िकोश निर्माता तर्क-तीर्थ लक्मण शासत्ी जोशी ऋषि दयाननद की महत्ा लिखते हुए कहते हैं कि सैकड़ों िषयों से हिंदुति के दुर्बल होने के कारण भारत बारंबार पराधीन हुआ । इसका प्रतरक् अनुभव महर्षि सिामी दयाननद ने किया । इसलिए उनहोंने जनमना जातिभेद और मूर्तिपूजा जैसी हानिकारक रुढ़ियों का निर्मूलन करनेवाले वि्िवरापी महतिाकांक्ा यु्त आर्यधर्म का उपदेश किया । इस श्ेणी के दयाननद यदि हजार वर्ष पूर्व उतपन् हुए होते , तो इस देश को पराधीनता के दिन न देखने पड़ते । इतना ही नहीं , प्रतरुत वि्ि के एक महान् रा्ट् के रूप में भारतवर्ष देदीपरमान होता । �
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