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का । उस इलाकें में हिंदू मुशसलम की संखरा बराबर थी । जिन्ा ने उस इलाके में मंडल को भेजा और मंडल ने वहां दलितों का मत पाकिसतान के पक् में झुका दिया जिसके बाद सिल्हाट पाकिसतान का हिससा बना जो आज बांगलादेश में है । पाकिसतान निर्माण के कुछ ि्त बाद ही गैर मुशसलमों को निशाना बनाया जाने लगा । पाकिसतान में रुकने वाले हिनदुओं के साथ लूटिमार , बलातकार और हतरा की घटिनाएं सामने आने लगीI मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी । जोगेंद्र नाथ मंडल को बाहर करने के लिये उनकी देशभक्त पर संदेह किया जाने लगा । मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस पाकिसतान को उनहोंने अपना घर समझा था अब वह उनके रहने लायक नहीं है । मंडल बहुत आहत हुए ्रोंकि उनहें वि्िास था पाकिसतान में दलितों के साथ अनरार नहीं होगा । लगभग दो साल में ही दलित-मुशसलम एकता का मंडल का खबाब टिूटि गया । जिन्ा की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर , 1950 को लियाकत अली खां के मंत्ी मंडल से तराग पत् देकर भारत आ गये ।
जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने तरागपत् में मुशसलम लीग से जुड़ने और अपने इसतीिे की वजह को सप्टि किया । मंडल ने लिखा , ' बंगाल में मुशसलम और दलितों की एक जैसी हालात थी , दोनों ही पिछड़े और अमशमक्त थे । मुझे आ्िसत किया गया था मुशसलम लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाये जायेंगे जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा और हम सब मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे , जिससे सामप्रदायिक शांति और सौहार्द बढ़ेगा । इनही कारणों से मैंने मुशसलम लीग का साथ दिया । 1946 में पाकिसतान के निर्माण के लिये मुशसलम लीग ने ‘ डायरेक्ट ए्शन डे ’ मनाया था , जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए । कलकत्ा के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिनदुओं हिकी हतराएं हुई , सैकड़ों ने इसलाम कबूल लिया । हिंदू महिलाओं का बलातकार , अपहरण किया गया । इसके बाद मैंने दंगा
प्रभावित इलाकों का दौरा किया । मैंने हिनदुओं के भयानक दुःख देखे फिर भी मैंने मुशसलम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा । 14 अगसत 1947 को पाकिसतान बनने के बाद मुझे मंमत्मंडल में शामिल किया गया । मैंने खिाजा नजीममुद्ीन से बात कर ईस्ट बंगाल की कैबिनेटि में दो पिछड़ी जाति के लोगों को शामिल करने का अनुरोध किया । उनहोंने मुझसे ऐसा करने का वादा भी किया लेकिन इसे टिाल दिया गया जिससे मै बहुत हताश हुआ ी
मंडल ने अपने खत में पाकिसतान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटिनाओं जिक्र किया । उनहोंने लिखा , ' गोपालगंज के पास दीघरकुल में एक मुशसलम की झूठी शिकायत पर सथानीय नामशूद्र परिवारों के साथ क्रूर अत्याचार किया गया । पुलिस के साथ मिलकर सथानीय मुसलमानों ने नामसूद्र समाज के लोगो को पीटिा और घरों को लूटिा । एक गर्भवती महिला की इतनी बेरहमी से मपटिाई की गयी कि उसका मौके
पर ही गर्भपात हो गया , मनदवोष हिनदुओं विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगो पर सेना और पुलिस ने हिंसा को बढ़ािा दिया । हबीबगढ़ में मनदवोष हिंदू पुरुषों और महिलाओं को पीटिा गया । सेना ने न केवल मनदवोष हिंदुओं को बेरहमी से मारा बशलक उनकी महिलाओं को सैनर शिविरों में भेजने के लिए मजबूर किया ताकि वो सेना की कामुक इचछाओं को पूरा कर सके । मैं इस मामले को आपके संज्ञान में लाया था , मुझे इस मामले में रिपोटि्ड के लिये आ्िसत किया गया लेकिन रिपोटि्ड नहीं आई ' I मंडल आगे लिखते हैं , ' खुलना जिले के कलशैरा में सशसत् पुलिस , सेना और सथानीय लोगो ने निर्दयता से हिंदुओं के पूरे गांव पर हमला किया । कई महिलाओं का पुलिस , सेना और सथानीय लोगों द्ारा बलातकार किया गया । मैने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास के गांवों का दौरा किया . जब मैं कलशैरा में गया तो देखा वह सथान खंडहर में बदल चिुका है । लगभग 350
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