eMag_June 2026_DA | Seite 9

जाररी अ्वैध धमाांतरण को रोका नहीं जा सका है । ऐसे में एक ऐसे सखत कानून करी प्रबल आ्वश्यकता दिखाई देतरी है, जिससे अ्वैध धमाांतरण के दुषचक्र को पूर्ण रूप से ध्वसत लक्या जा सके ।
गंभीर है डी-लिसस्टिंग का मुद्ा
जनजातरी्य समाज के बरीच डरी-लिस्टिंग एक बड़ा मुद्ा बन चुकरी है, जोकि धमाांतरित और गैर-धमाांतरित जनजातरी्य लोगों के मध्य सामाजिक तना्व और टकरा्व का कारण बन रहरी है । देश के जनजाति सुरक्षा मंच जैसे जनजातरी्य संग्ठन लगातार ्यह मांग कर रहे हैं कि अ्वैध धमाांतरण के दुषचक्र में फंसकर जनजातरी्य समाज का जो व्यसकत अपना मूल धर्म छोड देता है, उसे अनुसूचित जनजाति
( एसटरी) के श्ेणरी में मिलने ्वाले आरक्षण ए्वं अन्य सरकाररी लाभों से ्वंचित कर लद्या जाना चाहिए ।
हालांकि जनजातरी्य समाज के रोष को देखते हुए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजसथान जैसे राज्यों करी राज्य सरकारें अ्वैध धमाांतरण को रोकने के लिए ' धर्म स्वतंत्ता अलधलन्यम '( जैसे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजसथान में) के प्रा्वधानों को सखत बना रहरी हैं । इसके बाद भरी डरी-लिस्टिंग करी मांग बढ़तरी जा रहरी है क्योंकि जनजातरी्य समाज के जो लोग अ्वैध धमाांतरण करके ईसाई ए्वं मुससलम बन गए हैं, ्वह धमाांतरण के साथ हरी अलपसंख्यक कानूनों का लाभ उ्ठाने के साथ हरी अनुसूचित जनजालत्यों के लाभों को भरी हडप रहे हैं ।
डरी-लिस्टिंग करी मांग सबसे पहले 1970 में
पू्व्ष सांसद ए्वं जनजातरी्य नेता डा. कार्तिक उरां्व ने उ्ठा्यरी थरी । डा. उरां्व ने संसद में डरीलिस्टिंग का मुद्ा उ्ठाते हुए लोकसभा में एक प्रस्ताव पेश लक्या था, जिसे 348 सांसदों का समर्थन प्रापत था । मांग का मुख्य उद्ेश्य जनजातरी्य समाज के उन लोगों को अनुसूचित जनजाति( एसटरी) करी सूचरी और आरक्षण के लाभ से बाहर करना था, जो अपना धर्म बदलकर ईसाई ्या इसलाम धर्म अपना चुके थे । उनका कहना था कि अ्वैध धर्म परर्वत्षन करने ्वाले लोग अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मानकों में अंतर का लाभ उ्ठाकर आरक्षण और अलपसंख्यक दोनों सुल्वधाओं का दोहरा लाभ उ्ठाकर मूल जनजालत्यों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं ।
लेकिन डा. उरां्व के प्रस्ताव को चर्च के प्रलतलनलध्यों के दबा्व में ततकालरीन सरकार पारित नहीं करा पाई । 1970 में डरी-लिस्टिंग के लिए हुई ्यह मांग स्व्यं दर्शातरी है कि जनजातरी्य समाज के मध्य अ्वैध धमाांतरण को दशकों से अनदेखा लक्या जाता रहा है । धर्मपरर्वत्षन करने ्वाले लोगों को एसटरी करी सरीमा से बाहर नहीं लक्या जाना, मूल जनजातरी्य समाज के लिए अभिशाप बन चुका है क्योंकि अ्वैध रूप से धर्मानतरित ईसाई ए्वं मुससलम लोग मूल लन्वालस्यों के अधिकारों को हडप रहे हैं ।
डरीलिस्टिंग करी मांग कर रहे जनजातरी्य समाज के लोग कहते हैं कि ल्वशेष संस्कृति, परंपरा, प्रककृलत केंद्रित जरी्वन दर्शन ए्वं आसथा उनकरी पहचान है और जो अ्वैध धर्मानतरण करके ईसाई ए्वं मुससलम बन ग्या है, ्वह अपनरी पहचान खो चुका होता है । जनजालत्यों के परंपरागत कानून न के्वल उनकरी संस्कृति को लन्यंलत्त करते हैं, बसलक उत्राधिकार, ल्वरासत, ल्व्वाह, दे्वताओं करी पूजा आदि भरी करते हैं । ल्वलभन्न जनजालत्यों करी ल्वशेषताएं अलग-अलग होने के बाद भरी ्वह लनल्व्ष्वाद रूप से ल्वलभन्न हिनदू दे्वताओं करी पूजा-अर्चना करते हैं ।
डरीलिस्टिंग के अलभ्यान में संल्वधान के अनुचछेद-342 में ्ठरीक ्वैसा हरी संशोधन लक्या जाना है, जैसा कि अनुचछेद-341 में है अर्थात एससरी जनजालत्यों के मानक में एससरी जालत्यों
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