eMag_June 2026_DA | Seite 41

भरी था । जब ्वण्षव्य्वसथा का सथान जालत्वाद ने ले लल्या था । कोई व्यसकत रिाह्मण गुण, कर्म और स्वाभा्व के सथान पर नहीं अपितु जनम के सथान पर प्रचलित लक्या ग्या । इससे पू्व्ष ्वैदिक काल में किसरी भरी व्यसकत का ्वण्ष, उसकरी शिक्षा प्रासपत के उपरांत उसके गुणों के आधार पर निर्धारित होता था । इस बिगाड़ व्य्वसथा में एक रिाह्मण का बेटा रिाह्मण कहलाने लगा चाहे ्वह अनपढ़, मुर्ख, चररत्हरीन क्यों न हो और एक शुद्र का बेटा के्वल इसलिए शुद्र कहलाने लगा क्योंकि उसका पिता शुद्र था । ्वह चाहे कितना भरी गुण्वान क्यों न हो । इसरी काल में सृसषट के आदि में प्रथम संल्वधानकर्ता मनु द्ारा निर्धारित मनुसमृलत में जालत्वादरी लोगों द्ारा जालत्वाद के समर्थन में मिला्वट कर दरी गई । इस मिला्वट का मुख्य उद्ेश्य मनुसमृलत से जालत्वाद को स्वरीककृत कर्वाना था । इससे न के्वल समाज में ल्वध्वंश का दौर प्रारमभ हो ग्या अपितु सामाजिक एकता भरी भंग हो गई । स्वामरी द्यानंद द्ारा आधुनिक इतिहास में इस घोटाले को उजागर लक्या ग्या । ईसाई मिशनररी करी तो
जैसे मन करी मुराद पूररी हो गई । दलितों को भड़काने के लिए उनहें मसाला मिल ग्या । मनु्वाद जैसरी जुमले प्रचलित लक्ये गए । मनु महर्षि को उस मिला्वट के लिए गालल्यां दरी गई जो उनकरी रचना नहीं थरी । इस ्वैचारिक प्रदुषण का उद्ेश्य हर प्राचरीन गौर्वशालरी इतिहास और उससे समबंलधत तथ्यों के प्रति जहर भरना था । इस नकारातमक प्रचार के प्रभा्व से दलित समाज न के्वल हिनदू समाज से चिढ़ने लगे अपितु उनका बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मानतरण करने में सफल भरी रहे ।
इतिहास के साथ खिलवाड़
इस चरण में बुद्ध मत का नाम लेकर ईसाई मिशनरर्यों द्ारा दलितों को बरगला्या ग्या । भारतरी्य इतिहास में बुद्ध मत के असत काल में तरीन व्यक्तियों का नाम बेहद प्रलसद् रहा है । आदि शंकराचा्य्ष, कुमारिल भट्ट और पुष्यलमत् शुंग । इन तरीनों का का्य्ष उस काल में देश, धर्म और जाति करी परिससथलत के अनुसार महान तप ्वाला था । जहाँ एक ओर आदि शंकराचा्य्ष ने
पाखंड, अन्धविश्वास, तंत्-मंत्, व्यभिचार करी दरीमक से जर्जर हुए बुद्ध मत को प्राचरीन शासत्ाथ्ष शैलरी में परासत कर ्वैदिक धर्म करी सथापना कररी गई ्वहरीँ दूसररी ओर कुमारिल भट्ट द्ारा माध्यम काल के घनघोर अँधेरे में ्वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का संकलप लल्या ग्या । ्यह का्य्ष एक समाज सुधार के समान था । बुद्ध मत सदाचार, सं्यम, तप और संघ के सनदेश को छोड़कर मांसाहार, व्यभिचार, अन्धविश्वास का प्रा्यः बन चूका था । ्ये दोनों प्र्यास शासत्री्य थे तो तरीसरा प्र्यास राजनरीलतक था । पुष्यलमत् शुंग मगध राज्य का सेनापति था । ्वह महान राषट्भकत और दूरदृसषट ्वाला सेनानरी था । उस काल में सम्राट अशोक का नाला्यक ्वंशज बृहदरथ राजगद्दी पर बै्ठा था । पुष्यलमत् ने उसे अनेक बार आगाह लक्या था कि देश करी सरीमा पर बसे बुद्ध ल्वहारों में ल्वदेशरी ग्ररीक सैनिक बुद्ध भिक्षु बनकर जासूसरी कर देश को तोड़ने करी ्योजना बना रहे है । उस पर तुरंत का्य्ष्वाहरी करे । मगर ऐशो आराम में मसत बृहदरथ ने पुष्यलमत् करी बात पर कोई ध्यान नहीं लद्या । ल्व्वश होकर पुष्यलमत् ने सेना के
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