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निररीक्षण के सम्य बृहदरथ को मौत के घाट उतार लद्या । इसके पशचात पुष्यलमत् ने बुद्ध ल्वहारों में छिपे उग्र्वालद्यों को पकड़ने के लिए हमला बोल लद्या । ईसाई मिशनररी पुष्यलमत् को एक खलना्यक, एक हत्यारे के रूप में लचलत्त करते हैं । जबकि ्वह महान देशभकत था । अगर पुष्यलमत् बुद्धों से द्ेर करता तो उस काल का सबसे बड़ा बुद्ध सतूप न बन्वाता । ईसाई मिशनरर्यों द्ारा आदि शंकराचा्य्ष, कुमारिल भट्ट और पुष्यलमत् को निशाना बनाने के कारण उनकरी रिाह्मणों के ल्वरोध में दलितों को भड़काने करी नरीलत थरी । ईसाई मिशनरर्यों ने तरीनों को ऐसा दशा्ष्या जैसे ्वे तरीनों रिाह्मण थे और बुद्धों को ल्वरोधरी थे । इसलिए दलितों को बुद्ध होने के नाते तरीनों रिाह्मणों का बहिषकार करना चाहिए ।
हिन्दू तयोहारों और देवी- देवताओं के नाम पर भ्ामक प्िार ईसाई मिशनररी ने हिनदू समाज से समबंलधत
त्योहारों को भरी नकारातमक प्रकार से प्रचारित करने का एक न्या प्रपंच लक्या । इस खेल के परीछे का इतिहास भरी जानिए । जो दलित ईसाई बन जाते थे । ्वे अपने ररीलत-रर्वाज, अपने त्योहार बनाना नहीं छोड़ते थे । उनके मन में प्राचरीन धर्म के ल्वर्य में आसथा और श्द्धा धर्म परर्वत्षन करने के बाद भरी जरील्वत रहतरी थरी । अब उनको कट्टर बनाने के लिए उनको भड़काना आ्वश्यक था । इसलिए ईसाई मिशनरर्यों ने ल्वश्वल्वद्याल्यों में हिनदू त्योहारों और उनसे समबंलधत दे्वरी दे्वतों के ल्वर्य में अनर्गल प्रलाप आरमभ लक्या । इस परड्यंत् का एक उदहारण लरीलज्ये । महिषुर लद्वस का आ्योजन दलितों के माध्यम से कुछ ल्वसश्वद्याल्यों में ईसाई्यों ने आरमभ कर्वा्या । इसमें शोध के नाम पर ्यह प्रलसद् लक्या ग्या कि कालरी दे्वरी द्ारा अपने से अधिक शसकतशालरी मूललन्वासरी राजा के साथ नौ दिन तक पहले श्यन लक्या ग्या । अंतिम दिन मदिरा के नशे में दे्वरी ने शुद्र राजा महिषासुर का सर काट
लद्या । ऐसरी बेहूदरी, बचकाना बातों को शौध का नाम देने ्वाले ईसाई्यों का उद्ेश्य दशहरा, दरी्वालरी, होलरी, ओणम, श्रावणरी आदि पर्वों को पाखंड और ईसटर, गुड फ्ाइडे आदि को पवित्र और पा्वन सिद्ध करना था । दलित समाज के कुछ ्यु्वा भरी ईसाई्यों के बहका्वें में आकर मूर्खता पूर्ण हरकते कर अपने आपको उनका मानसिक गुलाम सिद्ध कर देते है ।
हिंदुतव से अलग करने का प्यास
ईसाई समाज करी तेज खोपडरी ने एक बड़ा सुलन्योजित धरीमा जहर खोला । उनहोंने इतिहास में जितने भरी का्य्ष हिनदू समाज द्ारा जालत्वाद को मिटाने के लिए लक्ये गए । उन सभरी को छिपा लद्या । जैसे भसकत आंदोलन के सभरी संत कबरीर, गुरु नानक, नामदे्व, दादूद्याल, बस्वा लिंगा्यत, रल्वदास आदि ने उस काल में प्रचलित धार्मिक अंधल्वश्वासों पर निषपक्ष होकर अपने ल्वचार कहे थे । समग्र रूप से पढ़े तो हर
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