eMag_June 2026_DA | Page 22

अ. भा. जनजाति सांस्ककृतिक समागम विशेषांक

जो मूल कर्तव्यों को बताता है, सपषट रूप से अभिव्यकत लक्या ग्या है । उकत अनुचछेद के खंड( 5) में ्यह कथित है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का ्यह कर्तव्य होगा कि ्वह भारत के सभरी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व करी भा्वना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश ्या ्वग्ष पर आधारित सभरी भेदभा्व से परे हो, ऐसरी प्रथाओं का त्याग करें जो ससत््यों के सममान के ल्वरूद्ध हैं । निःसंदेह इसका ्यह अर्थ होगा कि भारतरी्य शैलरी करी धर्म निरपेक्षता कुछ और नहीं बसलक प्राचरीन सम्य से हमारे पू्व्षजों का व्य्वसा्य और परिपाटरी हरी है और जो भ्रातृत्व के रूप में ल्वख्यात है । अतः लोक व्य्वसथा के नाम पर लन्यनत्ण भारत के संल्वधान के अनुचछेद-25 में ्यथा अंतल्व्षषट धर्म निरपेक्षता के सिद्धानतों का किसरी प्रकार का उललंघन नहीं है ।
7. समरीक्षा किए जाने ्वाला अगला प्रश्न ्यह है कि इसमें ऊपर सुझाए गए उपा्यों से अर्थात ऊपर दिए गए प्रककृलत के लन्यमों के जाररी किए जाने से भारत के संल्वधान में परिभाषित समानता के सिद्धानतों का उललंघन होगा ्या नहीं? अनुचछेद-15 में साधारणत्या ्यह घोषित लक्या ग्या है कि राज्य किसरी नागरिक के ल्वरूद्ध के्वल धर्म, मूल ्वंश, जाति, लिंग, जनम सथान ्या इनमें से किसरी के आधार पर कोई ल्वभेद नहीं करेगा और अनुचछेद-15 का उप अनुचछेद( 4) ्यह कथन करते हुए इसमें जोडता है कि उका अनुचछेद करी कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृसषट से पिछडे हुए नागरिकों के किनहीं वर्गों करी उन्नति के लिए ्या अनुसूचित जालत्यों और अनुसूचित जनजालत्यों के लिए कोई ल्वशेष अनुबंध करने से लन्वारित नहीं करेंगरी । इस प्रकार अनुचछेद-14 और 15 में अंतल्व्षषट समानता के सिद्धानत एक अप्वाद लेंगे अर्थात अनुसूचित जालत्यों और अनुसूचित जनजालत्यों के हित करी उन्नति और ्यह संरक्षणातमक ल्वभेद के नाम से ज्ञात राज्य के लिए करी जाने ्वालरी एक ल्वर्य ्वसतु हो सकतरी है ।
8. इसके अतिरिकत राज्य का एक कर्तव्य है कि ्वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को सामाजिक न्या्य और सभरी प्रकार
के शोषण से संरक्षा करें( अनुचछेद-46) तथा भाग-4 का अनुचछेद-37 ्यह बताता है कि उकत भाग में अन्तर्विषट सिद्धानत देश के शासन ने मूल होंगे और राज्य का ्यह कर्तव्य होगा कि ्वह ल्वलध्यां बनाने में इन सिद्धानतों को लागू करे । इस प्रकार ऊपर सुझाई गई प्रककृलत का कोई लन्यम समानता के सिद्धानतों के उललंघन में नहीं कहा जा सकता है और दूसररी ओर ्यह भारत के संल्वधान के अनुचछेद-37 के साथ गल्ठत अनुचछेद-46 में अंतल्व्षषट आदेश के अनुरूप होगा ।
9. उप्यु ्षकत ल्वलन्यमों को भारत के संल्वधान के अनुचछेद-73 और 256 के अधरीन केन्द्री्य सरकार को दरी गई शक्तियों के अधरीन जाररी लक्या जाना प्रसथालपत लक्या जाता है । पू्व्ष्वतवी द्ारा संघ करी का्य्षकाररी शसकत को उन सभरी ल्वर्यों करी बा्वत ल्वसतारित लक्या जाता है, जिनके संबंध में संसद को ल्वलध्यां बनाने करी शक्तियां है ।
अनुचछेद-256 के अधरीन संघ करी का्य्षकाररी शसकत को राज्य को ऐसे लनददेश देने के लिए भरी ल्वसतारित लक्या जाता है जो उस प्र्योजन के लिए आ्वश्यक हों । इस प्रकार इसमें ऊपर सुझाई गई प्रककृलत का कोई लन्यम पूर्णतः केन्द्री्य सरकार करी शसकत के भरीतर है और ऐसे लन्यम अनुचछेद-256 के अनुसार सभरी राज्यों को जाररी किए गए लनददेश का भाग बन सकते हैं । ्यह और उललेखनरी्य है कि जब ऐसा कोई का्य्षकाररी अनुदेश भारत के संल्वधान के अनुचछेद-73 के अधरीन जाररी लक्या जाता है तो उसमें सं्वैधानिक ल्वलध का बल होना समझा जाएगा, क्योंकि उकत अनुदेश भारत के संल्वधान के अनुचछेद-15( 4), 46 और 51( क) में अंतल्व्षषट सं्वैधानिक उपबंधों को लागू करने के लिए है ।( देखें-इंदिरा साहनरी बनाम भारत संघ 1992( 3) एस०सरी०सरी० 217, पृष्ठ 558)
10. ऊपर सुझाए गए अनुदेश इस घोषणा
22 twu 2026