eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 48

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पर विचार करके हमें अपनी समसया का समाधान मिल सकता है ।
सजातीय विवाह प्रथा की बवहगयोत्ीय विवाहों पर जकड़ ही जातिप्रथा का कारक है , लेकिन बात इतनी सरल नहीं । हम मान लेते हैं कि एक ऐसा समुदाय है , जको एक जाति बनाना चाहता है और विचार करता है कि सजातीय विवाह प्रथा के प्रचलन के लिए कौन सा माधयम अपनाए । यदि ककोई समुदाय सजातीय विवाह पद्धति कको दरकिनार करके अंतरजातीय विवाह निषेध का उललंघन करता है और अपने समुदाय के बाहर विवाह रचा लेता है , तको वह वयर्थ है । विशेष रूप से इस परिप्रेक्य में कि सजातीय विवाह प्रथा के पहले सभी विवाह बवहगयोत् हकोते थे । फिर सभी
दुनिया का ककोई अनय सभय देश ऐसा नहीं है , जको आदिम मानयताओं से लिपटा हको । इस देश का धर्म आदिम है और इसके आदिम संकेत इस आधुनिक काल में भी पदूरे जकोर-शकोर से इस पर हावी हैं । इस सिलसिले में मैं बवहगयोत् विवाह का उललेख करना चाहता हदूं । आदिम युग में बवहगयोत् विवाहों का प्रचलन सर्वविदित है । युग परिवर्तन के साथ-साथ तको इस श्द की सार्थकता ही जाती रही और रकत के घनिषटतम रिशते कको छकोड़कर इस संबंध में विवाहों पर ककोई प्रतिबंध ही नहीं रहा , लेकिन भारत में आज भी बवहगयोत् विवाह प्रथा ही प्रचलित है । भारतीय समाज में आज भी कबीला प्रथा मौजदूद है , हालांकि कबीले नहीं रहे । विवाह पद्धति इसका प्रमाण है , जको बवहगयोत् प्रथा पर आधारित है । यहां सपिंड विवाहों पर ही प्रतिबंध नहीं है , बबलक सगोत्र विवाह भी अपवित् माने जाते हैं ।
इसलिए आपकको सबसे महत्िपदूण्स बात याद रखनी है कि सजातीय प्रथा भारत के लिए विदेशी प्रथा है । भारत में विभिन्न गोत्र हैं और ये बवहगयोत् विवाह से संबंधित हैं । ऐसे ही अनय
वर्ग भी हैं , जको टकोटम अर्थात् देवों कको मानते हैं । यह कहना ककोई अतिशयोक्ति नहीं हकोगी कि भारत में बवहगयोत् विवाह एक विधान है और इसका उललंघन संभव नहीं , यहां तक कि जात भीतर विवाह प्रथा के बावजदूद , गोत्र बाहर विवाह पद्धति का कठकोरता से पालन किया जाता है । गोत्र वाहर विवाह करने की प्रथा का उललंघन करने पर जात बाहर विवाह करने वालों की तुलना में कठकोर दंड का विधान है । आप देख सकते हैं कि बवहगयोत् विवाह का नियम बना दिया जाए तको जातिप्रथा का आधार ही मिट जाए , कयोंकि बवहगयोत् का अर्थ परसपर विलय है , परंतु हमारे यहां जातिप्रथा है । परिणाम यही निकता है कि जहां तक भारत का संबंध है , यहां बवहगयोत् विवाह विधान से अंततः जाति अर्थात् सजातीय विवाह विधान भी जुड़ा है । बहरहाल , मदूल रूप से बवहगयोत्ी समाज में सजातीय विवाह विधान का पालन सरलता से संभव है , जको जातिप्रथा का मदूल है और गंभीर समसया है । इसी विधान के माधयम से बवहगयोत् विवाहों के रहते सजातीय विवाह हकोता है । इसी
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