eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 47

दिया है , उसे ददूसरे ने दर्शाया है । मैं केवल उन सदूत्ों पर विचार रखदूंगा और उनका मदूलयांकन करूंगा , जको उपर्युकत परिभाषाओं के अनुसार सभी जातियों में समान रूप से पाए जाते हैं , जको जाति की खासियत माने जाते हैं ।
हम सेनार से शुरू करते हैं । वह अपमिश्रण की बात करते हैं और यह बताते हैं कि यह जाति की प्रककृवत है । इसे देखते हुए यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि यह किसी जाति से संबंधित नहीं है । यह आमतौर पर पदूजा-समारकोहों से संबंद्ध बात है और शुद्धता के सामानय सिद्धांत का पकोषक तति है । परिणामसिरूप इसका संबंध जाति से नहीं है और इसकी कार्यप्रणाली कको धिसत किए बिना , इसकको प्रतिरुद्ध किया जा सकता है । अपमिश्रण का सिद्धांत जाति से जकोड़
दिया गया है , क्योकि जको जाति सियोच् कही जाती है , वह पुरकोवहत वर्ग है ।
हम जानते हैं कि पुरकोवहत और पवित्ता का पुराना संबंध है । सार यही है कि अपमिश्रण का सिद्धांत तभी लागदू हकोता है , जब किसी जाति का धार्मिक सिभाव हको । श्री नेसफीलि अपने तरीके से कहते हैं कि जाति की प्रककृवत है कि उनके साथ खान-पान नहीं किया जाता , जको उनकी जाति के बाहर हैं । यह नया तथ्य है , फिर भी ऐसा लगता है कि श्री नेसफीलि इस वयिसरा के प्रभाव से अपरिचित हैं । चदूंकि जाति अपने में ही सीमित एक संसरा है , अतः वह सामाजिक अंतरंगता के विरुद्ध है , जिसमें खान-पान आदि पर भी पाबंदी है । परिणाम यह निकलता है कि बाहरी लकोगों से खान-पान पर पाबंदी सकारातमक निषेध का कारण नहीं है , बबलक जातिप्रथा परिणाम है अर्थात् भिन्नता का गुरुमंत् है । इसमें ककोई संदेह नहीं कि खान-पान पर प्रतिबंध भिन्नता के कारण नहीं है , बबलक यह एक धार्मिक वयिसरा है , परंतु यह तति बाद में जुड़ा है । सर एच . रिजले ने विशेष धयान देने यकोगय ककोई बात नहीं कही है ।
अब हम डा . केतकर की परिभाषा का विशलेषण करते हैं । उनहोंने इस विषय कको और विशद् रूप दिया है । केवल यही बात नहीं है कि वह भारत के निवासी हैं , बबलक उनहोंने विवेचनातमक और पैनी दृबषट से निषपक् राय दी है , जको जातिप्रथा के बारे में उनके अधययन के कारण हुआ है । उनकी परिभाषा विचारणीय है , कयोंकि उनहोंने जातितंत् का विशलेषण जातिप्रथा के आधार पर किया है और अपना धयान केवल उनहीं लक्णों तक केंद्रित रखा है , जको जातिप्रथा के अंतर्गत जाति के अबसतति में अनिवार्य है । उनहोंने फालतदू बातों की ठीक अवहेलना की है , जको गौण और क्वणक हैं । उनकी परिभाषा के बारे में कहा जा सकता है कि उनके विचरों में कहीं रकोड़ी भ्रांति है , वैसे उनमें विशदता और सपषटता है । वह रकोटी-बेटी के वयिहार में भेदभाव की बात कहते हैं । मेरा कहना है कि मदूल बात एक ही है , रकोटी से भी परहेज है और बेटी वयिहार से भी , पर
डा . केतकर ने बताया है कि ये हैं एक ही सिकके के दको पहलदू । यदि आप बेटी वयिहार पर पाबंदी लगाते हैं , तको इसका अर्थ हुआ कि आप परिधि संकुचित कर लेते हैं । इस प्रकार ये दकोनों लक्ण एक ही पदक के मुखय भाग तथा पृषठ भाग हैं ।
जातितंत् के इस समीक्ातमक मदूलयांकन से इसमें ककोई संदेह नहीं रह जाता है कि सजातीय विवाह का निषेध या ऐसे विवाह का न पाया जाना ही जातिप्रथा का मदूल है , परंतु अमदूत्स नृविज्ान के आधार पर कुछ ऐसे लकोग इस बात कको नकार सकते हैं , कयोंकि सजातीय विवाह के पक्धर वर्ग जातीय समसया बढ़ाए बिना ऐसा कर सकते हैं । सामानयतः यह संभव है , कयोंकि यह एक मदूत्स सतय है कि सजातीय विवाह समर्थक समाज सांस्कृतिक रूप से भिन्न रहकर अलग बबसतयों में बस सकता है , जहां एक-ददूसरे से ककोई मतलब न हको । इस बारे में एक युबकतसंगत उदाहरण दिया जा सकता है कि अमरीकन भारतीयों के नाम से विखयात नीग्रको समुदाय और गकोरों के विभिन्न कबीले अमरीका में मौजदूदा हैं , परंतु हमें इस संबंध में भ्रांति नहीं रहनी चाहिए कि भारत में बसरवत भिन्न है । जैसा कि पहले कहा जा चुका है , भारत में सजातीय प्रथा है । भारत की विभिन्न प्रजातियां कुछ खास क्ेत्ों में निवास करती हैं और उनका आपस में मेल-जकोल है तथा उनमें सांस्कृतिक एकता है , जको सजातीय समाज का एकमात् मापदंड है । ऐसी सजातीयता कको आधार मानने से जातिप्रथा एक नयी समसया का रूप धारण करती है , जको केवल सजातीय विवाह समर्थक समाज या कबीलों से अलग बसरवत है । भारत में जातिप्रथा का अर्थ है समाज कको कृत्रिम हिससों में विभाजित करना , जको रीति-रिवाजों और शादी वयिहार की भिन्नताओं से बंधे हों । परिणाम सपषट है कि सजातीय विवाह एकमात् लक्ण है , जको जातिप्रथा की विशेषता है और यदि हम यह जताने में सफल हको जाएं कि सजातीय विवाह ही कयों हकोते हैं तको हम वयािहारिक रूप से यह साबित कर सकते हैा कि जातियों की उतपवत् कैसे हुई और इनका ताना-बाना कया है ? यहां यह बताना असंगत न हकोगा कि आज
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