विकराल समसया है । यह समसया जितना वयािहारिक रूप से उलझी है , उतना ही इसका सैद्धांतिक पक् इनद्रजाल है । यह ऐसी वयिसरा है , जिसके फलितार्थ गहन हैं । हकोने कको तको यह
एक सरानीय समसया है , लेकिन इसके परिणाम बड़े विकराल हैं । '' जब तक भारत में जातिप्रथा विद्मान है , तब तक हिनदुओं में अंतर्जातीय विवाह और बाह्य लकोगों से शायद ही समागम
हको सके , और यदि हिंददू पृथ्वी के अनय क्ेत्ों में भी जाते हैं तको भारतीय जात-पांत की समसया विशि की समसया हको जाएगी ।''
सैद्धांतिक रूप से अनेक महान विद्ानों ने ,
जिनहोंने श्रम की चाह की खातिर इसके उद्भव तक पहुंचने का प्रयास सिीकारा था , उनकको निराश हकोना पड़ा । ऐसी बसरवत में मैं इस समसया का उसकी समग्रता की दृबषट से समाधान नहीं
कर सकता । मुझे आशंका है कि समय , सरान और कुशाग्रता मुझे असफल कर देगी , यदि मैंने इस समसया कको िगटीककृत न करके अपनी सीमाओं से अधिक सपषट करने का प्रयत्न किया । जिन पक्ों कको मैं निरूपति करना चाहता हदूं , वे हैं , जातिप्रथा की संरचना , उतपवत् और इसका विकास । प्रसिद्ध नृजाति-विज्ावनयों के अनुसार , भारतीय समाज में आयषों , द्रविड़ों , मंगकोवलयों और शकों का सबममश्रण है । ये जातियां देश-देश से शताब्दयों पदूि्स भारत पहुंचीं और अपने मदूल देश की सांस्कृतिक विरासत के साथ यहां बस गईं । तब इनकी बसरवत कबायली वाली थी । ये अपने पदूि्सिवत्सयों कको धकेल कर इस देश के अंग बन गए । इनके परसपर सतत संपकषों और संबंधों के कारण एक समबनित संस्कृति का सूत्रपात हुआ , परंतु भारतीय समाज के विषय में यह बात कहना असंगत है कि वह विभिन्न जातियों का संकलन है । पदूरे भारत में भ्रमण करने पर यह साक्य मिलेगा कि इस देश के लकोगों में शारीरिक गठन और रंग-रूप की दृबषट से कितना अंतर है । संकलन से सजातीयता उतपन्न नहीं हकोती है । यदि रकत-भेद की दृबषट से देखा जाए तको भारतीय समाज विजातीय है , हां यह संकलन सांस्कृतिक रूप से अतयंत गुंथा हुआ है । इसी आधार पर मेरा कहना है कि इस प्रायद्ीप कको छकोड़कर संसार का ककोई देश ऐसा नहीं है , जिसमें इतनी सांस्कृतिक समरसता हको । हम केवल भौगकोवलक दृबषट से ही सुगठित नहीं हैं , बबलक हमारी सुवनबशचत सांस्कृतिक एकता भी अविबचछन और अटूट है , जको पदूरे देश में चारों दिशाओं में वया्त है । इसी सांस्कृतिक एकरूपता के कारण जातिप्रथा इतनी विकराल समसया बन गई है कि उसकी वयाखया करना कठिन कार्य है । यदि हमारा समाज केवल विजातीय या सबममश्रण भी हकोता , तब भी ककोई बात थी , किंतु यहां तको सजातीय समाज में भी जातिप्रथा घुसी हुई है । हमें इसकी उतपवत् की वयाखया के साथ-साथ इसके संरिमण की भी वयाखया करनी हकोगी ।
आगे विशलेषण करने से पदूि्स हमें जातितंत् की प्रककृवत पर भी विचार करना हकोगा । मैं
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