eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Página 44

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डॉ आंबेडकर और जाति प्रथा

डॉ भीमराव आंबेडकर

मैं निःसंककोच कह सकता हदूं कि हममें

से बहुत लकोगों ने सरानीय , राषट्रीय या
अंतरा्सषट्रीय संग्रहालय देखे होंगे , जको सभयता का समग्र रूप प्रसतुत करते हैं । इस बात पर कुछ लकोगों कको ही विशिास आएगा कि संसार में मानव संसराओं का प्रदर्शन भी हकोता है । मानवता-वचत्ण विवचत् विचार है , कुछ कको यह बात अजीब गकोरखधंधा लग सकती है , किंतु नृजाति-विज्ान का विद्ारटी हकोने के नाते आप इस अनुसंधान पर कठकोर रुख नहीं अपनाएंगे और कम से कम आपकको यह आशचय्सजनक नहीं लगना चाहिए ।
मेरा मानना है कि सबने कुछ ऐतिहासिक सरल देखे होंगे , जैसे पोम्पियाई के खंडहर और बड़ी उतकंठा से गाइडों की धाराप्रवाह जबान में इन खंडहरों का इतिहास सुना हकोगा । मेरे विचार में नृजाति-विज्ान का विद्ारटी भी एक मायने में गाइड ही है । वह अपने प्रककृतरूप की तरह ( शायद अधिक गांभीर्य और सि-ज्ानार्जन की आकांक्ा के साथ ) सामाजिक संसराओं कको यथासंभव निषपक्ता से देखता है और उनकी उतपवत् तथा कार्यप्रणाली का पता लगाता है ।
इस गकोषठी का विचारणीय विषय है - आदिकालीन बनाम आधुनिक बनाम आधुनिक समाज । इसमें भाग लेने वाले मेरे सहयकोवगयों ने इसी आधार पर आधुनिक या प्रागैतिहासिक संसराओं के सार्थक उदाहरण दिए हैं , जिनमें उनका अधययन है । अब मेरी बारी है । मेरे आलेख का विषय है- ' भारत में जातिप्रथाः संरचना , उतपवत और विकास ।' आप जानते हैं कि यह विषय कितना जटिल है , जिसके संबंध में मुझे अपने विचार वयकत करने हैं । मुझसे जयादा यकोगय विद्ानों ने जाति के रहसयों कको खकोलने का प्रयास किया है , किंतु यह दुःख की
बात है कि यह अभी तक वयाखयावयत नहीं हुआ है और लकोगों कको इसके बारे में अलप जानकारी है । मैं जाति जैसी संसरा की जटिलताओं के प्रति सजग हदूं और मैं इतना
निराशावादी नहीं हदूं कि यह कह सकूं कि यह पहेली अगम , अज्ेय है , कयोंकि मेरा विशिास है कि इसे जाना जा सकता है । जाति की समसया सैद्धांतिक और वयािहारिक रूप से एक
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