पद्धति है , जको प्रककृवत प्रदत् है । यह प्रककृवतधर्मा इसलिए कहलाती है कयोंकि हिन्दू धर्म का दस लक्ण या तति प्राककृवतक मानकों पर आधारित
सामाजिक वयिसराओं का सिद्धानत है । हिन्दू धर्म के उसके समसत उपांग या लक्ण प्राककृवतक नियमों का अनुपालन करते हैं और अपनी सनातन आधयाबतमक ऊर्जा कको बचाए रखते हैं ।
सिनधु घाटी और सरसिती सभयता , दजला- फरात की सभयता , मधय एशिया के कालासागर तट की सभयता , सिथियन , यदूनान , असीरियन , सुमेरियन , खाबलियन , रकोमन आदि संस्कृतियों की भांति हिन्दू संस्कृति मानव समाज के संवहन हेतु अभिजातय संस्कृति नहीं है । हिन्दू संस्कृति कभी पुराना या वनषप्रयकोजय नहीं हको सकती । इस ज्ान एवं रहसय कको ज्ात कर हजारों वर्ष पहले भारतीय ऋषियों ने इसे समसत मानव के कलयाणार्थ समप्रेवषत किया है । हिन्दू संस्कृति का महत्ि प्रतयेक वयबकत , प्रतयेक समुदाय और प्रतयेक देश के लिए है । यह सर्वदा कलयाणकारी है । हिन्दू संस्कृति के उतरान के संघर्ष एवं प्रयास कको आज देश में चाहे जिस दृबषट से देखा जाए , किनतु हिनदुओं के इस प्रयास के पीछे भी विशि कलयाण का ही भाव निहित है । सनातन एवं सार्वभौमिक हकोने के कारण यह समसत लकोगों के लिए वयािहारिक रूप में सिीकार यकोगय है । इस संस्कृति में सहिषणुता के सिाभाविक एवं प्राककृवतक भाव हैं । इसमें संगठन के भी प्राककृवतक भाव और सामाजिक समरसता के गुण प्रा्त हकोते हैं ।
हिन्दू संस्कृति में वया्त कुरीतियों , भेदभाव , ऊंच-नीच के भाव तथा अमीरी-गरीबी के अनतर अतार्किक एवं अर्थहीन हैं । 2000 िषषों से लगातार आरिमणों एवं आठ सौ िषषों की लमबी गुलामी , उतपीड़न एवं नर-संहार ने हिन्दू समाज कको उकत बुराइयों के साथ सिार्थयुकत चररत् की दिशा में धकेल दिया है । अनयरा हिन्दू परमपरा तको मर्यादित आचरण , सतयवनषठ वयिहार , वैज्ावनक दृबषटककोण , भ्रातृति की भावना , पड़कोसी धर्म , सिमे-सुखनतु निरामया तथा वसुधैवकुटुमबकम् जैसी विशेषताओं से परिपदूण्स है । हिन्दू जीवन-पद्धति की पकोषक प्रककृवत सियं उससे ही पकोवषत रही है । प्रककृवत
प्रदत् हिन्दू जीवन-पद्धति हिन्दू संस्कृति का आधार है । इस पद्धति कको सार्वभौम जीवन- पद्धति भी कहते हैं । इस पद्धति के वैबशिक आयाम का विशलेषण करते हुए यह कहना उचित हकोगा कि हिन्दू सामाजिक संरचना कको विशि के समसत देशों में वयिहृत किया जाए जिससे प्रगति के अननत आयाम सितः जीवनत एवं प्रककृवत के हितपकोषण के लिए सुलभ हको उठेंगे । हिन्दू जीवन-पद्धति कको विकसित करने वाला एकमात् हिन्दू धर्म है , जिसे सम्पूर्ण जगत् धारण कर मानवीय कलयाण सुवनबशचत कर सकता है । इस जीवन-पद्धति में जिस संस्कृति का निर्माण हुआ है वह सत् , ऋत् एवं ब्ह्म से परिपदूण्स है । एक बार पुनः इसका उललेख आवशयक है कि हिन्दू धर्म कको पंथ , मजहब या रिलीजन के समतुलय न समझ कर जीने की एक सार्वभौमिक पद्धिति के रूप में समझा जाए ।
हिन्दू जीवन-पद्धति का विशलेषण करने से यह ज्ात हकोता है कि यह जीवन-पद्धति प्रककृवतजनय विधाओं का समग्र है । यह कुछ रीति-रिवाज अथवा पदूजापाठ की पद्धति ही नहीं , अपितु प्रककृवत के साथ सामंजसय बैठाकर जीवन जीने का सिद्धानत है । यह पद्धति पदूण्सरूपेण विज्ान सममत एवं वयािहारिक है । मानव विकास के विभिन्न सिद्धानतों के अवलकोकन से यह भी सपषट है कि विकास के रिम में मानव ने प्राककृवतक वरियाओं से अपने जीवन जीने की कला का विकास किया है । इस सनदभ्स में यह धयान देने यकोगय बात है कि अनय मानव समदूहों की अपेक्ा भारतीय ऋषियों ने प्रककृवत के शाशित गुणों कको अधिक सजगता से जांचा-परखा और उनहें अपनी सामाजिक वरिया का आधार बनाकर एक विशिषट जीवनशैली का विकास किया । यही जीवनशैली कालानतर में हिन्दू जीवन-पद्धति के रूप में वयिहृत है । इसी जीवनशैली के समाजीकरण के रिम में हिन्दू सामाजिक संसराओं ( परिवार आदि ) का आविर्भाव हुआ जिनहोंने हिन्दू जीवन-पद्धति में सामाजिक समरसता लाने का प्रयास किया । �
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