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लक्णों या ततिों के बारे में जानना आवशयक है , वह इस प्रकार है-धृति , क्मा , दम , असतेय , शौच , इबनद्रय-निग्रह , धी , विद्ा , सतय तथा अक्रोध । यही दस ततिों के युबकतसंगत आचरण का मानव वयवहार में अनुपालन की अपेक्ा ही हिंदुति की मर्यादा है । साथ तको यह है कि इन दस ततिों में एक या दको तति का पालन करने से ही मानव कको संत की श्रेणी प्रा्त हकोती है । उदाहरणसिरूप गाँधी जी कको देखा जा सकता है , जिनहोंने हिंदुति के मात् दको तति " सतय और अहिंसा " का आतमसात किया तको विशि समुदाय उनके पीछे चल पड़ा । हिंदुति के दसों तति कको धारण करने वाला वयबकत निसंदेह भगवान के रूप में सरवपत हकोता है । यही हिन्दू दर्शन में नर से नारायण बनने की प्रवरिया या सिद्धांत है । हिंदुति के इनही दस ततिों का धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष के पुरुषार्ध से आबद्ध हिन्दू संस्कृति में दिनचर्या और ऋतुचर्या के अनुरूप चारों पुरुषारषों में किया जाता है । हिंदुति के दसों ततिों कको जीवन के प्रतयेक क्ेत् में अभयास में लाया जाता हैI ऐसे में हिन्दू जीवन पद्वत सितः पदूण्स वैज्ावनक और वयािहारिक सिरुप में सजीव हको उठती है । इन ततिों के अनुकूलन में सामाजिक समरसता के वयापक प्रभाव का अनुमान एवं अवलकोकन करने के बाद ही वाह्य शबकतयों ने भारत पर आरिमण कर इन पर प्रतयक् रूप से प्रहार किया और भारत की समरसता कको समा्त करने में सफल रहे । यदि इन ततिों कको सिसर एवं सिचछ मनःबसरवत से निरभिमानपदूि्सक सुप्रवतबषठत कर दिया जाय तको भारतीय समाज में सामाजिक समरसता कको सितः सरावपत हकोने से ककोई रकोक नहीं सकता है ।
इस प्रकार अब हम अगर हिन्दू धर्म पर विचार करे तको हिन्दू धर्म की सार्वभौमिकता पर ककोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता । यह एकमात् मानव धर्म है , जको अनादि , सनातन तथा चिरनतन है । यह धर्म उदार एवं सर्वग्राही है । यह एक संवदेनशील धर्म है कयोंकि वह चिनमय ततिों कको भौतिकता के संचालन के लिए सजगतापदूि्सक प्रयुकत करता है । हिन्दू धर्म
का आतमबकोध है सभी प्राणियों के सनतुवलत विकास के लिए प्रककृवत का संरक्ण करना । इस धर्म का दार्शनिक आयाम विसतीण्स है , जिसमें अद्ैतवाद , शुद्धाद्ैत , विशिषटाद्ैत तथा द्ैतवाद का अप्रतिम चिनतन समाहित है । हिन्दू धर्म के उपादान ( आधार भदूवम ) हैं-वेद , उपनिषद , समृवतयां तथा परमपरा से चला आ रहा शिषटाचार । हिन्दू धर्म के पुराणादि ग्रनरों में विशि के मानव कलयाण की जको संभावनाएं निहित हैं , वे किसी मत विशेष से आबद्ध नहीं हैं ।
हिन्दू धर्म केवल विशिासों और सिद्धानतों का समुच्य नहीं है । हिन्दू धर्म के वैदिक काल की वैज्ावनक उपलब्धयों कको सामानय वयबकत भी सहजभाव से सिीकार करता है । हिन्दू धर्म प्रककृवत का पकोषक एवं उससे पकोवषत रहा है , अतएव इसे प्राककृवतक मानकों पर आधारित सामाजिक वयिसराओं का सिद्धानत कहा जाता है । हिन्दू धर्म ही मानव जीवन-पद्धति कको विकसित करने वाला एकमात् कारक है । इस धर्म कको सम्पूर्ण जगत् धारण कर मानवीय कलयाण सुवनबशचत कर सकता है । इसे समसत मतों की जननी भी कहा जाता है , जिसका प्रसार संस्कृत वाङ्मय में निहित है ।
हिन्दू धर्म प्रबुद्ध तथा एकताबद्ध मानव समदूह और परिवेश का समयक् भावदर्शन है , जिसमें मानवता के ज्ात , अज्ात , भौतिक , आधयाबतमक इतयावद सभी तति अपनी सम्पूर्णता के साथ निरनतर सवरिय तथा प्रवाहमान रहते हैं । हिन्दू धर्म मानवता के हित समबद्ध्सन से जुड़ा हुआ है । हिन्दू धर्म वयबकतगत जीवन कको धारण करने वाले नियमों , सामाजिक वरियाओं कको धारण करने वाले नियमों और समसत संसार कको धारण करने वाले नियमों के लिए प्रयुकत है । यह पाशचातय श्द ‘ रिलीजन ’ से परिभाषित नहीं किया जा सकता है कयोंकि ‘ रिलीजन ’ तको किसी न किसी मत , समुदाय या पंथ कको सम्बोधित करता है , जको किसी एक समदूह की मानयता हको सकती है । ददूसरी बात यह भी है कि ‘ रिलीजन ’ में न तको सार्वभौमिकता पाई जाती है और न ही वह सर्वग्राही हकोता है । अतएव
हिन्दू धर्म सामाजिक समरसता के सारभौमिक सिद्धांत के परिप्रेक्य में भी सियोत्म एवं सर्वग्राह्य है । हिन्दू संस्कृति का आधार भारतीय जीवन-
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