सामाजिक वयिसरा का लगातार पतन हकोता चला गया और हिन्दू समाज जातियों में विभकत हको गया । यह सिलसिला सैकड़ों सालों तक चलता रहा और फिर अंग्रेजी शासनकाल में जाति के आधार पर बांटने और अपनी सत्ा कको कायम करने की नीति ने हिन्दू समाज कको जाति के चरिव्यूह में फ़ांस कर रख दिया ।
माना जाता है कि हिनदुओं कको विभाजित रखने के उद्ेशय से वब्वटश राज में हिनदुओं कको तकरीबन 2,378 जातियों में विभाजित किया गया और हिनदुओं कको वब्वटशों ने नए-नए नए उपनाम देकर सपषट तौर पर जातियों में बांट दिया गया । हिन्दू श्द के उद्भव तथा इस श्द
की प्राचीनता पर सदैव सवाल खड़ा किया जाता है । सवाल पैदा करने वाले यह जानते हैं कि सनातन धर्म कको ही हिन्दू धर्म कहा जाता है । इसके बावजदूद अपनी अज्ानता कको न समझने वाले लकोग , जानबदूझकर एक सुवनबशचत मानसिकता एवं सुवनबशचत धयेय के कारण ही हिन्दू श्द पर आक्ेप लगाते नजर आते हैं । वासति में देखा जाए तको हिन्दू एक प्राचीन श्द है । हिन्दू श्द के साथ-साथ धर्म सियं प्राचीन है । धर्म श्द के साथ सनातन श्द कको जकोड़ने से इसकी प्राचीनता और धर्म के संतान यानी हजारों-हजार वर्ष प्राचीनतम हकोने की अनुभदूवत का आभास हको उठता है । सनातन श्द का अर्थ केवल प्राचीन नहीं , अपितु सनातन का अर्थ सदातन है । जको पहले था , आज भी है और जको भविषय में रहने वाला है , वही सनातन यानि शाशित है ।
हिन्दू श्द संस्कृत वयाकरण के अनुसार दको श्दों कको मिलाकर बना है । संधि विचछेद करने पर दको श्द " हि " और " ददू "। " हि " श्द बीजमंत् है । जैसे शिव उपासना के लिए " हं " बीजमंत् है , उसी प्रकार शबकत उपासना के लिए " हिं " बीज मंत् का प्रयकोग हकोता है यानी " हिं " का तातपय्स शबकत भाव से है । इसी प्रकार " ददू " श्द संस्कृत वयाकरण का संखयािाचक सर्वनाम प्रथमा का श्द रूप है । यानी ददू , दु , द् :। वद्िचन " दु " का अर्थ है दको प्रकार । अतः हिन्दू श्द का अर्थ हुआ दको प्रकार की शबकत । सम्पूर्ण ब्ह्माणि में दको ही प्रकार की शबकतयां हैं । एक आधयाबतमक शबकत और ददूसरी भौतिक शबकत । इस प्रकार हिन्दू श्द का अर्थ हुआ आधयाबतमक और भौतिक शबकत । इस प्रकार देखा जाए तको हिन्दू श्द का अर्थ आधयाबतमक शबकत और भौतिक शबकत अथवा आधयातम और विज्ान से हैI इसे इस तरह भी प्रकट किया जा सकता है कि ब्ह्माणि में दको ही प्रकार की शबकतयां हैं , आधयाबतमक और भौतिक शबकत तथा दकोनों शबकतयां जब एक हको जाती हैं तको उसे सर्वशबकतमान यानी ईशिर कहते हैं ।
इस प्रकार देखा जाए तको हिन्दू का अर्थ
आधयाबतमक और भौतिक ज्ान चिंतन के आधार पर मानव , मानव समाज और प्रककृवत की रक्ा तथा प्रककृवत की निरंतरता बनाये रखने की सामाजिक वयिसरा है । लेकिन हिन्दू कको परभाषित करने समय इस तथ्य कको धयान में रखना आवशयक है कि हिन्दू एक विशिषट जीवन दर्शन है , जिसका आधार प्रककृवत , विज्ान और आधयातम ज्ान है । यह किसी वयबकत विशेष द्ारा प्रतिपादित कुछ रीति-रिवाज , या नियम- कानदून नहीं , बबलक प्रककृवत के गहन अवलकोकन एवं चिंतन का लमबे काल तक की प्रवरिया मानव कलयाण हेतु प्रसतुवतकरण है । भारतीय मनीषा के संवाहक ऋषियों और मुनियों के यकोग , आगम-नियम , षडदश्सन , सिद्ध अवसरा , जप , धयान एवं तपसया के माधयम से प्रककृवत और प्रककृवत के अनुरूप मानव जीवन का भाव ज्ात कर लिया था । उन महापुरुषों ने अपने लमबे काल के ज्ान और अनुभवों के आधार पर हिन्दू ज्ान रुपी जीवन दर्शन का अनुशीलन किया । ऐसी बसरवत में उकत दृबषटककोणों कको धयान में रखने हुए हिन्दू की परिभाषा निम्नलिखित है -मानव द्ारा वयबकतगत रूप से जप-तप , धयान , यकोग एवं आराधना के युकत धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की वैचारिकी का पालन करते हुए आधयाबतमक एवं प्रककृवतपरक वैज्ावनक ज्ान पर आधारित जीवन जीने का दर्शन ही हिन्दू है ।
हिन्दू श्द में आधयाबतमक और भौतिक शबकत का अनंत भाव हकोने से हिन्दू के विराट सिरुप की कलपना सिाभाविक रूप से की जा सकती है । जिस प्रकार आधयाबतमक शबकत और भौतिक शबकत अनंत है , उसे प्रकार हिन्दू संस्कृति , हिन्दू ज्ान विज्ान , हिन्दू जीवन पद्वत एवं हिन्दू लकोक जीवन के प्रतयेक पक् का आधार आधयातम एवं भौतिक चिंतन हकोने से अनंत एवं विराट हैI हिन्दू का समबनध मनुषय मात् से नहीं , अपितु ब्ह्माणि से है और ब्ह्माणि भी विराट और अनंत है I
हिन्दू के बाद हिंदुति की चर्चा की जाए तको इसका सीधा सा अर्थ हकोता है-हिन्दू धर्म के तति यानी हिंदुतिI हिन्दू धर्म के जिन दस
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