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भारतीय सामाजिक व्यवथिा में नहीं थी जाति-उपजाति

डॉ विजय सोनकर शास्त्ी

समाज की जाति वयिसरा एक जटिल एवं प्रभावी विशिषटता भारतीय

है । यद्वप इसकी उतपवत् प्रारंभिक समाजिक वयिसरा में दृबषटगकोचर नहीं हकोता तथापि यह सामाजिक वयिसरा के विकास के साथ हीं अपने वासतविक सिरूप और जनम के आधार पर पैदा हकोती चली गयी । वैदिक काल में वर्ण वयिसरा का उललेख मिलता है । इस काल में वयबकतयों का वर्ण जनम के आधार पर न हकोकर कर्म के आधार पर था । लेकिन कलांतर में वर्ण की अवधारणा जटिल हकोती चली गई , अब वर्ण कर्म के आधार पर न हकोकर जनम के आधार पर माना जाने लगा तथा हिन्दू समाज अनेक समदूहों में विभकत हको गया और यह जनम पर आधारित पद्वत जाति-वयिसरा के सिरूप में परिवर्तित हकोती चली गयी । इसके विकसित हकोने में सैकड़ों वर्ष लगे हैं , तथापि समय-समय पर हकोने वाले परिवर्तन , प्रादेशिक उलट-फेर , विदेशी आरिमण , विभिन्न वयिसायिक गतिविधियां आदि अनेक कारणों एवं कारकों कको उत्रदायी माना जा सकता है ।
भारतीय समाज में जाति वयिसरा निरंतर प्रवाहमान रहा । सिर्फ उसमें जातियों और उपजातियां की संखया बढ़ती गई । गु्त काल के सामाजिक वयिसरा में वर्णवयिसरा का सिरूप जातिगत अर्थात वंशगत बना रहा । इस काल में लगभग 36 जातियों का उद्भव हको चुका था । ब्ाह्मणों एवं क्वत्यों की श्रेषठता इस काल में भी बनी रही । इसमें विदेशी मुबसलम आरिांताओं की बड़ी भदूवमका रही कयोंकि उनके आरिमण एवं विसतार में इन दकोनों जातियों द्ारा
अतयवधक अवरकोध था । वह इनहें ही मिटाने के लिए इनहें इनके वयिसायों के विरुद्ध असिचछ एवं निम्न कामों में लगाकर , उन कायषों एवं वयिसायों पर आधारित जातियों का निर्माण करते रहे । समय के साथ जातियों की संखया बढ़ी और संगठित हकोकर एक शबकतशाली
सिरूप धारण करती चली गयी । जातियों का विभाजन जनमगत , प्रदेशगत , वयिसायगत , भाषागत , धर्मगत आदि के आधार पर हकोता रहा । ब्ाह्मण , क्वत्य , वैशय एवं शदूद्र , यह ककोई जातियां नहीं थी , बबलक श्रम विभाजन की श्रेणियां थी । लेकिन इसके विपरीत सनातन
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