eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | страница 39

उनकी खुशहाली का महति शिक्ा में निहित नज़र आया ।
डॉ . आंबेडकर कको विशिास था कि वशवक्त हकोकर ही सत्ी अपने अधिकारों कको छीन सकती है । उनका मानना था कि परिवार में सत्ी शिक्ा ही वासतविक प्रगति की धुरी है । जिस घर में पढ़ी लिखी सत्ी व मां हको उस घर के बच्ों का
भविषय अपने आप उज्जवल हको जाता है । सत्ी शिक्ा कको डॉ . आंबेडकर अतयवधक महति देते हुए कहते है कि अगर घर में एक पुरूष पढ़ता
है तको केवल वही पढ़ता है और यदि घर में सत्ी पढ़ती है तको पदूरा परिवार पढ़ता है । डॉ . आंबेडकर ने भारतीय साहितय में प्राचीन से लेकर आधुनिक साहितय के साथ-साथ विदेशी साहितय का भी अचछी प्रकार से अधययन मनन किया था । साहितय अधयययन के दौरान वशवक्त व सितनत् बसत्यों उदाहरण के रूप में उनके सामने बुद्ध की थेरियों से लेकर सावित्ी बाई फूले व उनकी कई महिला वमत् थीं , जिनहोंने पढ़-लिख कर समाज परिवर्तन के लिए काम किया । इसलिए वह दलित सत्ी कको वशवक्त करने के लिए प्रतिबद्ध थे । परिवार में औरत की बसरवत सुदृढ़ करने के लिए डॉ . आंबेडकर ने शिक्ा के महति के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों जैसे बाल विवाह , बहु-पत्निवाद , देवदासी प्रथा आदि के खिलाफ भी अपनी जनसभाओं में बात रखी । परिवार में लड़की-लड़के का पालन-पकोषण समान रूप से हकोना चाहिए ।
उनहोंने दलित परिवारों से अनुरकोध किया कि वे अपने बच्ों की खासकर लड़कियों की शादी बचपन में ना करें । ‘ पालक अपनी संतान की शादी कम उम्र में करके उनके जीवन कको नरक ना बनाएं ।’ डॉ . आंबेडकर ने विवाह जैसे सवाल पर भी बातचीत की । ‘ पत्नी कैसी हकोनी चाहिए इस बारें में पुरूषों का विचार जाना जाता है । वैसे ही पति कैसा हको ? इस बारें में पत्नी का मन जान लेना जरूरी है । सत्ी एक वयबकत है और उसे भी वयबकत सितनत्ता की सुविधा हकोनी चाहिए ।
डॉ . आंबेडकर भारतीय परिवारों में लड़कियों की सुदृढ़ बसरवत चाहते थे । परिवार में लड़के- लड़कियों का सही प्रकार से पालन तभी हको सकता था जबकि परिवार में बच्े कम हको । भारतवर्ष में खुशहाल परिवार के लिए प्रचलित परिवार नियकोजन का नारा आजादी के बाद का है । परनतु बाबा साहब ने सत्ी के संदर्भ में परिवार नियकोजन के फायदे बहुत पहले ही देख लिए थे । वे ये भी जानते थे कि इस सब के लिए देश के युवा वर्ग कको समझाने व उसकको साथ लेने से ही परिवार कको खुशहाल बनाया जा सकता है । इसलिए उनहोंने 1938 में विधार्थियों की
एक सभा में बकोलते हुए कहा कि परिवार नियकोजन की जबाबदारी सत्ी-पुरूष दकोनों की हकोती है । बच्ों का लालन पालन हम अचछी तरह कर सकते हैं । कम संतान हकोने पर बसत्यां अपनी शबकत बाकी कामों में लगा सकती हैं ।
बसत्यों की समानता और सितनत्ता के संदर्भ में डॉ . आंबेडकर बाकी चिंतकों एवं समाज सुधारकों से काफी आगे की समझ रखते थे । अनय समाज सुधारक जहां नारी शिक्ा कको परिवार की उन्नति व आदर्श मातृति कको संभालने या नारी की बसत्योंचित गुणों के कारण ही उसकी उपयकोवगता पर बल देते थे । परनतु नारी भी मनुषय है उसके भी अनय मनुषयों के समान अधिकार है । इस बात कको सिीकार करने में हिचकिचाते थे । उसकी इस मानवीय गरिमा कको सर्वप्रथमतः आधुनिक युग में डॉ . आंबेडकर ने ही सरावपत किया । वे चाहते थे कि पत्नी की बसरवत घर में दासी जैसी ना हकोकर उसकी हैसियत बराबरी की हको । उनहोंने लड़कों के समान लडकियों कको पढ़ाने के साथ-साथ उसका विवाह भी उचित उम्र में हको , इस पर बार-बार जकोर दिया । इस विषय पर डॉ . आंबेडकर कहते हैं कि शादी एक महत्पूर्ण जबाबदारी है । शादी करने वाली हर औरत कको उसके पक् में खड़ा रहना चाहिए लेकिन उसकको दासी नहीं बबलक बराबरी के नाते या वमत् के तौर पर । यदि ऐसा करकोगी तको अपने साथ समाज का भी अभयुदय करकोगी और अपना सममान बढ़ाओंगी । इस हेतु सभी बसत्यों कको पुरूष के बराबर हिससेदारी कर खुद कको शासक की जमात बनाने हेतु प्रयास करना चाहिए । डॉ . आंबेडकर महिलाओं कको उसकी समाज द्ारा दी गई भदूवमकाएं मां , पत्नी , बहन एवं उसके बसत्योंचित गुणों से इतर उसकको पदूण्स सितनत् , सिसर एवं प्रगतिशील कर्मठ मानवी के रूप में देखते थे । उनके जीवन दर्शन में निहित सिसर प्रफुबललत वशवक्त , समाजिक सरकोकारों में भागीदार दलित और गैर दलित सत्ी अतयनत महतिपदूण्स सरान पर सरावपत थी । �
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