eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 38

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दलित महिलाओं की स्थिति कै सी हो ?

सं विशिसतरीय चिंतक हैं , जिनहोंने परिवार

विधान निर्माता बाबा साहब डॉ . भीम राव आंबेडकर एकमात् ऐसे
और समाज में सत्ी की बसरवत कैसी हको , इस पर गहन चिंतन-मनन किया । पुरूषों के साथ सत्ी कको भी समानता व सितनत्ता मिले , उसे समाजिक आजादी के साथ आर्थिक आजादी भी प्रा्त हको , परिवार में उसका दर्जा पुरूष के समान हको , इसके लिए उनहोंने दलित एवं गैर दलित बसत्यों कको समाज परिवर्तन के आन्दोलन में सवरिय रूप से जुड़ने का आह्ान किया । दकोनों जगत यानि घर और समाज में नारी की हीनतर बसरवत कको देखकर उन्होने इस विषय पर खदूब सकोचा कि भारतीय सत्ी की बसरवत में रिांवतकारी परिवर्तन कैसे आये ? यह रिांवतकारी परिवर्तन परिवार तथा समाज में नारी कको विशेषाधिकार देकर ही किया जा सकता था ।
डॉ . आंबेडकर का मानना था कि सत्ी तथा समाज की उन्नति , शिक्ा के बिना नही हको सकती । सुनदर और सुवशवक्त व सभय परिवार के लिए आवशयक है कि पुरूषों के साथ-साथ घर की बसत्यां भी पढ़ी लिखी हको ताकि वे समाज परिवर्तन की प्रवरिया में शामिल हको सके । समाज के परिवर्तन द्ारा ही बसत्यों की मुबकत समभि है । डॉ . आंबेडकर का अनुभव जगत देश-विदेश दकोनों था । दकोनों जगत में बसत्यों ने कितनी प्रगति की इसकी तुलना करने पर वह जमीन आसमान का अनतर पाते थे । विदेशों में उनहोंने बसत्यों कको सिसर वातावरण में पढ़ते-लिखते व उसकी प्रतिभा कको विकसित हकोते देखा था , परनतु भारत में हिन्दू सत्ी अनेक प्रकार की रूढ़ियों , अनधविशिासों व सामाजिक बनधनों में जकड़ी थी । हिन्दू सत्ी में दलित सत्ी की हालत तको और
शकोचनीय थी । घर और समाज में उनका मानसिक , शारीरिक , आर्थिक शकोषण हकोता था । दलित सत्ी के लिए उसका परिवार किसी नरक
से कम नही था । दलित परिवारों में सत्ी शिक्ा नाममात् के लिए भी नही थी । उनहोंने विदेश में वशवक्त व खुशहाल सत्ी कको देखा तको उनहें
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