eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Seite 37

हको सकते हैं आपका अपना तर्क हको सकता है । आपकी वयाखया अलपािवध या लमबी अवधि के हिसाब से बदल भी सकती हैI
आदिवासी समुदायों के बीच धन की सामुदायिक बचत की एक संकलपना है जिसे ' धान का गकोला ' कहा जाता है । धान का गकोला जिसका वजरि बहुत से विद्ानों ने भी किया है परंतु पढ़ कर समझने से पहले निजी अनुभव से आदिवासियों के एक छकोटे से आर्थिकी कको समझने की ककोवशश करते हैं । आधुनिक अर्थवयिसरा में जिस प्रकार वित्ीय बैंक का महति है , ऐसा ही महति आदिवासियों के जीवन में ' धान का गकोला ' का है । इसे साधारण भाषा में धान का बैंक कहा जा सकता है । अकसर इसकी शुरुआत गांव सतर पर अगहन के दिनों में हकोती है , यानी की जब धान पया्स्त मात्ा में सबके घर में हकोता है । अगर किसी गांव में 10 घर हैं तको हरेक घर शुरुआत में कुछ धान , गकोला में जमा करेगा ,
जैसे - अगर हरेक घर 5-5 पैला ( सेर ) जमा करते हैं तको 50 पैला हको जायेगा । जब धान जमा हको जाये तको इसे गांव की अर्थवयिसरा कको ठीक करने और किसी भी परिवार कको सामानय सदूद में ऋण दिया जाता है । जैसे , अगर धान बुवाई के समय किसी के पास बीज के लिए धान की कमी हको जाये तको नगणय दर पर उसे धान ऋण दिया जाता है फिर जब अगले वर्ष अगहन के महीने में पया्स्त उपज हको जाये तको ऋणी वयबकत सदूद समेत धान वापस करेगा और ' धान का गकोला ' में भी इजाफ़ा हकोगा । जब ये प्रवरिया सतत काफी सालों तक चले और ' गकोला ' में पया्स्त वृद्धि हको जाये तको धान की कुछ न्यूनतम मात्ा कको गकोला के लिए छकोड़कर बाकी कको सभी साझेदार परिवार आपस में बांट लेते हैं । इस तरीके से सुरवक्त भविषय के लिए सार्वजानिक बचत प्रणाली का और आदिवासी आर्थिक वयिसरा के ' धान बैंकिंग ' प्रणाली का विकास हुआ ।
धीरे-धीरे इस वयिसरा का क्य हको रहा है कयोंकि इस पर भी अति-पदूंजीवादी वयिसरा की जबरदसत मार पड़ी है । तातपय्स यह है कि लकोग धान लेने के बाद वापस नहीं करते हैं । इस प्रकार एक वयबकत के धान वापस नहीं करने , ददूसरे वयबकत के द्ारा धान वापस नहीं करने और इस प्रकार ऐसे लकोगों की संखया बढ़ते जाये तको उसे ' धान का गकोला ' में संकट की बसरवत कही जाएगी । और ऐसी पररबसरवत में बचे हुए लकोग शेष धान कको आपस में बांटकर ' धान का गकोला ' कको बंद कर देते हैं । इस प्रकार आदिवासी समाज में एकजुटता तथा समाजवादी वयिसरा का प्रतीक काफी सारे गांवों में अंतिम सांसें भी लेने लगा है । आधुनिक बैंकिंग प्रणाली , धान कम और पैसे की जयादा जरूरत ने लकोगों कको अतयवधक वयबकतपरक और सिारटी बना दिया है और अभी की बसरवत में ' धान का गकोला ' एक इतिहास मात् बनने की ओर अग्रसर है I
वित्ीय और गैर-वित्ीय संपवत् की बचत , पर्यावरण और प्राककृवतक संसाधनों की बचत से सीधे तौर पर कैसे संबंधित है आइए समझने की ककोवशश करते हैं । गौर करने वाली बात है कि एक तरफ वित्ीय या गैर-वित्ीय बचत पर आदिवासी समुदाय का धयान भले न गया हको लेकिन जैसे ही पर्यावरण या प्राककृवतक संसाधनों के बचत की बात आती है आदिवासी समुदाय पहली पंबकत में खड़ा नजर आता है । शायद इसलिए कयोंकि इनका जीवन-दर्शन सीधे तौर पर प्रककृवत से जुड़ा हुआ है । वित्ीय और गैर- वित्ीय संपवत् से रिमशः वित्ीय / धन पदूंजी और भौतिक पदूंजी का निर्माण हकोता है । उसी प्रकार प्रककृवत से प्राककृवतक पदूंजी का निर्माण हकोता है । प्राककृवतक पदूंजी का सही इसतेमाल सतत विकास के लिए बहुत जरूरी है और यही वजह है आदिवासी समुदाय हमेशा प्रककृवत के बचाव मुद्रा में हकोता है । ददूसरा दृबषटककोण ये कहता है कि लगभग 500 ईसा पदूि्स पृथ्वी / प्रककृवत 10 करकोड़ जनसंखया कको बर्दाशत कर चुका है और अभी 700 करकोड़ से जयादा जनसंखया कको भी पालने में सक्म है .
( साभार ) tuojh 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 37