eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 34

laLd`fr

का कदाचित अंतिम उललेखनीय लेख ' तुलसीदास ' शीर्षक से 1921 में ' एनसाइक्लोपीडिया ऑफ रेलिजन एणि एथिकस ' में निकला । यह लेख ग्रियर्सन के तुलसी संबंधी समग्र विचारों का सारांश प्रसतुत करता है ।
ग्रियर्सन के पशचात भारतीय संस्कृति पर विचार के रिम में तुलसीदास कको आधुनिक दृबषट से देखने का संकेत विलसन के यहां भी मिलता है । ' द-सकेच ऑफ दि रेलिजस सेकटर ऑफ दि हिंददूज ' नामक विलसन का एक निबंध 1831 में ' एशियाटिक रिसर्च ' में पहली बार छपा । जैसा कि शीर्षक से सपषट है , इस निबंध में हिंददू धर्म पर चर्चा के रिम में तुलसी का वजरि आया है । अतः विलसन के यहां तुलसी की रचनाओं पर ककोई विशेष चर्चा नहीं हुई है , केवल कुछ रचनाओं का नामकोललेख है । विलसन द्ारा प्रसतुत तुलसी का जीवन-वृत् नाभादास के विवरणों एवं जनश्रुतियों पर आधरित है । विलसन के इस प्रयत्न में सबसे महत्िपदूण्स तथ्य यह है कि एक विदेशी विद्ान ने इस क्ेत् में रुचि दिखाई है । इसमें आलकोचनातमक विशलेषण की तलाश करने की तुलना में इसे एक प्रसरान बिंदु के रूप में देखना चाहिए । जहां से तुलसी साहितय पर विशलेषणातमक अधययन का रिम शुरू हकोता है । इसका प्रमाण यह है कि , विलसन के बाद के कई विद्ानों ने तुलसी पर लिखते हुए विलसन द्ारा प्रसतुत विवरणों का प्रयकोग किया है ।
तुलसी कको धर्म और अधयातम के खाते में डालने की यह प्रवृवत् दरअसल हिंदी के मधयकालीन तेजसिी भबकत-कावय के केंद्र पर अंग्रेजों सबसे सशकत हमला था जिसका असर भविषय पर भी पड़ना था , और वह बड़ी निर्ममता से पड़ा भी । जैसे हिंददू-मुबसलम एकता कको , वैसे ही तुलसी की समनियातमक चेतना कको भी , अंग्रेजों ने दको हिससों में बांट दिया । तको , यही वह पृषठभदूवम है जिसमें मानस की प्रगतिशील वयाखयाओं कको छुपाया गया । दलित चेतना कको पदमे में डाला गया ताकि देश कको विभाजित रखे रहा जाए और शासन किया जा सके । जबकि
काकभुशुबणि प्रकरण का गंभीर अधययन करने के बाद मानस का एक अलग ही चेहरा सामने आता है ।
काकभुशुबणि , तुलसी के साथ-साथ शिव व सियं राम द्ारा भी समर्थित , राम भबकत के प्रखर प्रवकता हैं- ' मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ' राम भबकत का सामाजिक-सार , तुलसी व शिव के मत में , केवल काकभुशुंडि ही जानते हैं । इसीलिए विषणु के वाहक गरुण , मकोहवश , सशंकित , जब शिव के पास जाते हैं , तको शिव
रामभबकत के मर्म कको समझने हेतु उनहें काकभुशुंडि के पास ही भेजते हैं । काकभुशुंडि और गरुण का यह संवाद ही मानस का असली दर्शन है जको अवद्तीय है । नारद और शांडिलय से अधिक बेहतर और लौकिक , भबकत की अवधारणा काकभुशुंडि उत्रकांड में रखते हैं ।
शिव तको कथा सुनाकर पार्वती का मकोह भर हरते हैं पर मानस की धरती पर राम कथा और भबकत के असली मम्सज् भुशुंडि ही हैं ।
काकभुभुशुंडि की जीवन दासतान अभिश्त है । किसी जनम में वे शदूद्र कुल में अवध में जनमे । शिव की परम भबकत की । उसके अलावा हर देवता की निंदा की -
' शिव सेवक मन रिम अरु बानी । आन देव निंदक अभिमानी ।'
यानी अवध में रहते हुए राम से विरकोध !
गुरु समझाते रहे किंतु यह अभिमान इतना बढ़ा कि- ' हरिजन वद्ज देखे जरउँ करउँ विषणु कर द्रकोह ।' पर , गुरु अपमान व विषणु द्रकोह का फल उनहें चखना पड़ा । सियं शिव उनहें भयंकर शाप देते हैं- ' अयुत जनम भरि पावहिं पीरा ' हालाँकि काकभुशुंडि द्ारा विनती करने पर वे द्रवित भी
34 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf tuojh 2021