eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 35

हकोते हैं तथा अखंड राम भबकत का वरदान भी देते हैं- ' अप्रतिहत गति हकोइहि तकोरी '। भबकत की अखंड पिपासा में फिर शदूद्र और ब्ाह्मण के रूप में अभिश्त , अनेक जनमों में भटकने के बाद दुबारा अवध में जनम लेने पर काकभुशुंडि कको प्रबकोध हकोता है तथा राम भबकत दृढ़ हकोती है- ' रघुपति जस गावत फिरहुँ छन छन नव अनुराग ।' इस प्रकार एक शदूद्र अपनी दृढ़ता से राम भबकत का सियोच् अधिकारी बनता है । पदूरे उत्रकांड में ज्ान-भबकत के आधिकारिक
निर्णायक यही शदूद्र-ऋषि काकभुशुंडि हैं । यही भुशुंडि राम कको ' गरीब निवाजे ' घकोवषत करते हैं ।
पदूरे मानस में भुशुंडी की ज्ान-भबकत तितिक्ा सबसे लकोमहर्षक है । एक संशयाकुल मन से वह राम के रहसय के पीछे भागते हैं । भकत-
भगवान् की यह कशमकश उत्रकाणि में अवद्तीय एवं पदूरा पढने यकोगय है-
जौं प्रभु हकोइ प्रसन्न बर देहदू । मको पर करहु ककृपा अरु नेहदू ॥
मन भावत बर मागउँ सिामी । तुमह उदार उर अंतरजामी ॥
( हे प्रभको ! यदि आप प्रसन्न हकोकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर ककृपा और स्ेह करते हैं , तको हे सिामी ! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हदूँ । आप उदार हैं और हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं ।)
दको० - अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जको गाव ।
जेहि खकोजत जकोगीस मुनि प्रभु प्रसाद ककोउ पाव ॥ 84 ( क )॥
( आपकी जिस अविरल ( प्रगाढ़ ) एवं विशुद्ध ( अननय निषकाम ) भबकत कको श्रुति और पुराण गाते हैं , जिसे यकोगीशिर मुनि खकोजते हैं और प्रभु की ककृपा से ककोई विरला ही जिसे पाता है ॥ )
भगत कलपतरु प्रनत हित ककृपा सिंधु सुखधाम ।
सकोइ निज भगति मकोवह प्रभु देहु दया करि राम ॥ 84 ( ख )॥
( हे भकतों के ( मन-इबचछत फल देने वाले ) कलपिृक् ! हे शरणागत के हितकारी ! हे ककृपासागर ! हे सुखधान राम ! दया करके मुझे अपनी वही भबकत दीजिए ॥ 84 ( ख )॥)
एवमसतु कहि रघुकुलनायक । बकोले बचन परम सुखदायक ॥
सुनु बायस तैं सहज सयाना । काहे न मागसि अस बरदाना ॥
(' एवमसतु ' ( ऐसा ही हको ) कहकर रघुवंश के सिामी परम सुख देनेवाले वचन बकोले- हे काक ! सुन , तदू सिभाव से ही बुद्धिमान है । ऐसा वरदान कैसे न माँगता ?)
सब सुख खानि भगति तैं मागी । नहिं जग ककोउ तकोवह सम बड़भागी ॥
जको मुनि ककोवट जतन नहिं लहहीं । जे जप जकोग अनल तन दहहीं ॥
( तदूने सब सुखों की खान भबकत माँग ली ,
जगत में तेरे समान बड़भागी ककोई नहीं है । वे मुनि जको जप और यकोग की अवनि से शरीर जलाते रहते हैं , करोड़ों यत्न करके भी जिसकको ( जिस भबकत कको ) नहीं पाते ।)
रीझेउँ देखि तकोरि चतुराई । मागेहु भगति मकोवह अति भाई ॥
सुनु बिहंग प्रसाद अब मकोरें । सब सुभ गुन बसिहहिं उर तकोरें ॥
( वही भबकत तदूने माँगी । तेरी चतुराई देखकर मैं रीझ गया । यह चतुराई मुझे बहुत ही अचछी लगी । हे पक्ी ! सुन , मेरी ककृपा से अब समसत शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे ।)
भगति गयान बिगयान बिरागा । जकोग चररत् रहसय बिभागा ॥
जानब तैं सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥
( भबकत , ज्ान , विज्ान , वैरागय , यकोग , मेरी लीलाएँ और उनके रहसय तथा विभाग - इन सबके भेद कको तदू मेरी ककृपा से ही जान जाएगा । तुझे साधन का कषट नहीं हकोगा ।)
धयान दें , मानस में यह अनकोखा भकत है जिसे ऐसा वरदान मिल रहा है कि उसे साधन का कषट नहीं हकोगा । यह दरअसल तुलसी की निर्मल दृबषट है जको भुशुणिी प्रकरण के माधयम से भबकत की सर्वथा एक नयी तसिीर हमारे सामने रखती है ।
ऐसे में आशचय्स हकोता है कि लकोग- ' ढकोल गँवार शदूद्र पशु नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी ।' जैसी एक लाइन तको प्रगतिशील जन चट से देख लेते हैं किंतु पदूरे उत्रकांड में काकभुशुंडि कको नहीं देख पाते जिसे तुलसी राम भबकत का सिरमौर बनाते हैं । इनहीं एक-दको लाइनों के आधार पर आज तक मानस कको दलित विरकोधी ग्रंथ सिद्ध किया जाता रहा है , जबकि भबकत की धुरी मानस में काकभुशुंडि के हाथों दे दी गई है । अतः विनय है कि मानस कको समग्रता में देखें और ' काकभुशुंडि-प्रसंगों ' कको पाठ्यरिमों में शामिल करें तथा उसके आधार पर मानस की दलित चिंता पर फिर से विचार विनिमय करें ।
( साभार ) tuojh 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 35