eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Página 33

में इसका पठन-पाठन चलाया । इस पाठ्यरिम में तुलसी का साहितय , विशेषकर मानस , मदूलतः भबकत और आधयातम के अर्थ में प्रवतबषठत किया गया तथा उसकी गहन सामाजिक-सांस्कृतिक वयंजना कको छिपा लिया गया । बबलक यह भी कि ' फूट डालको और राज करको ' की कूटनीति के हिसाब से उसकी वयाखयाओं में तथाकथित ब्ाह्मणवाद , पोंगापंथवाद , का चेहरा भी रकोप दिया गया ।
गकोसिामी तुलसीदास की रचनाओं एवं वयबकतति पर विसतृत एवं गहन मदूलयांकन का आरमभ जॉर्ज ग्रियर्सन के लेखन से हकोता है । इस अधययन एवं मदूलयांकन में ग्रियर्सन ने वैज्ावनक रीति से तुलसी पर चर्चा की है । सन् 1885 में वेन की अंतरराषट्रीय ओरिएंटल कांग्रेस के सामने ग्रियर्सन ने ' हिनदुसतान का मधयकालीन साहितय : विशेष रूप से तुलसीदास ' विषयक लेख प्रसतुत किया । इसमें लेखक ने गकोसिामी जी के जीवन-वृत् , रचनाओं एवं विचारधरा पर चर्चा की है । इनहीं सदूचनाओं कको कालांतर में ग्रियर्सन ने सन् 1889 में प्रकाशित अपने ग्रंथ ' माडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिनदुसतान ' में तुलसी पर लिखने में उपयकोग किया । सन् 1883 ' इंडियन : ए एंटिकिेरी ' में ग्रियर्सन का ' नको्टस आन तुलसीदास ' प्रकाशित हुआ । यह तीन भागों में है । पहला अंश कवि की प्रमुख तिथियों की गणना से संबंध रखता है । ददूसरा , ककृवतयों पर आधरित है । इसमें ककृवतयों की प्रामाणिकता पर चर्चा के उपरांत उन रचनाओं की सदूची दी गई है , जिनहें लेखक गकोसिामी जी की रचना मानता है । 6 छकोटे ग्रंथों एवं 6 बड़े ग्रंथों ; आकार की दृबषट से , कको कवि का सिीकार करके शेष उन सभी ग्रंथों कको छकोड़ दिया गया है , जिनहें गकोसिामी से जकोड़कर देखा गया था । लेखक द्ारा सिीककृत कवि की रचनाए इस प्रकार है- गीतावली , कवितावली या कवित् रामायण , दकोहावली या दकोहा रामायण , चौपाई रामायण , सतसई , पंचरत्न , श्री रामाज्ा संकट मकोचन , विनय पवत्का , हनुमानबाहुक और ककृषणािली । तीसरे अंश में कवि के जीवन-वृत् से संबंध रखने वाली परंपराओं का अधययन
एवं जनश्रुतियों का संकलन किया गया है ।
1897 में एशियाटिक सकोसायटी आफ़ बंगाल की कार्यवाही मे ग्रियर्सन का एक अनय नकोट ' तुलसीदास के कवित् रामायण की रचना तिथि ' छपा । इसमें कवितावली के छंदों के आधार पर इसमें वर्णित महामारी कको ्लेग माना गया है । इसी विषय पर ग्रियर्सन का एक अनय लेख ' तुलसीदास और बनारस में ्लेग के विषय में ददूसरा नकोट ' शीर्षक से उसी पवत्का में आया । 1903 में एक छकोटा लेख '' तुलसीदास-कवि और समाज सुधारक ' शीर्षक से रायल एशियाटिक सकोसायटी के जनरल में प्रकाशित हुआ । इसमें कवि के देहांत संबंधी ्लेग वाली धरणा कको ग्रियर्सन ने छकोड़ दिया और तुलसी कको एक समाज-सुधारक की भी छवि प्रदान की । 1907 में रॉयल एशियाटिक सकोसाइटी के
जनरल में ग्रियर्सन का लेख ' आधुनिक हिन्दू धर्म और नेस्टोरियनों के प्रति ' शीर्षक से छपा । इसी लेख में ग्रियर्सन ने भबकत मार्ग की उतपवत् का श्रेय प्रकारांतर से इनहीं नेस्टोरियन नामधरी ईसाई मिशनरियों कको दिया । धयातवय है कि ग्रियर्सन के इस विचार का तर्कपदूण्स ढंग से जकोरदार खणिन आगे चलकर भारतीय व पाशचातय दकोनों विद्ानों ने किया । कुछ ने तको ततकाल उसी वर्ष , उसी पवत्का में ही किया । 1913 में ' कया तुलसीदास ककृत रामायण अनुवाद ग्रंथ है ?'' शीर्षक लेख इसी रॉयल एशियाटिक सकोसाइटी के जनरल में प्रकाशित हुआ । इसमें ग्रियर्सन ने बलिया से प्रकाशित हकोने वाले एक संस्कृत रामायण कको ' रामचरितमानस ' का मदूल और मानस कको उसका अनुवाद कहे जाने का निराकरण किया है । तुलसीदास संबंधी ग्रियर्सन
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