eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 32

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रामचरितमानस की दलित चेतना

सववेश सिंह

का उत्रकांड , तुलसी द्ारा मानय भबकत और दर्शन का रामचरितमानस

निचकोड़ है । यहां काकभुशुंडि , गरुण कको राम भबकत का ज्ान देते हैं । यह भबकत अपने आप में अनकोखी है । मानस के नाम पर मठों में प्रचलित जको भबकत आज दिखती है , ठीक वही मानस द्ारा अधिककृत नहीं है । काकभुशुंडि द्ारा गरुण कको दी गई यह भबकत अमदूत्स , अगकोचर नहीं अपितु वयािहारिक रूप से मन के निग्रह , उसकी पवित्ता और सामाजिक सवरियता से
जुड़ी है । यहाँ सांप्रदायिक भबकत का भुशुंडि निषेध करते हैं , तथा उसे सामाजिक सामंजसय का हथियार मानते हैं । किंतु मानस में ये काकभुशुंडि आखिर हैं कौन ? यह कितना आशचय्सजनक और महतिपदूण्स है कि जिस रामचरितमानस कको दलित विरकोधी ग्रंथ कहा जाता है , उसमें रामभबकत के सियोच् अधिकारी काकभुशुंडि हैं , जको शदूद्र-ब्ाह्मण के , कर्म- फल-परिणाम और जातयांतर के चरि , में लय हैं-
' तेहि कलजुग ककोशलपुर जाई । जनमत भएउ
शदूद्र तन पाई ।।'
प्रश्न उठता है कि मानस में ये अभिवयबकतयाँ अब तक कयों छुपाई गईं थी ? दलित चेतना कको छुपाने के पीछे कया साजिश थी ? कौन लकोग थे ? कया मंशाएं थीं उनकी ? दरअसल , इसे समझने के लिए मानस की वयाखयाओं का इतिहास देखना पड़ेगा ।
वब्वटश काल में , तथाकथित आधुनिक शिक्ा के अनुरूप , ग्रियर्सन आदि विद्ानों ने तुलसी- साहितय का एक आंशिक पाठ्यरिम तैयार किया और साम्राजयिाद के हितों के अनुरूप हिंदुसतान
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