eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 26

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दलित बच्चों पर कहर बन रहा है फू लों की खेती का जहर

विवेक मिश्ा

में एक तरफ छकोटे किसान बेहतर आमदनी के लिए भले ही भारत

निर्यात हकोने वाले फूलों की खेती की तरफ आकर्षित हको रहे हैं लेकिन ददूसरी तरफ इसकी बड़ी कीमत मासदूम बच्ों कको चुकानी पड़ रही है । तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में बड़े पैमाने पर चमेली की खेती की जाती है , जिसमें राषट्रीय और अंतरराषट्रीय मानकों का उललंघन करते हुए प्रतिबंधित जहरीले रसायनों का इसतेमाल किया जाता है ।
चौंकाने वाला यह है कि सकूल का खर्चा निकालने और अपने परिवार कको आर्थिक मदद देने के लिए जयादातर दलित बच्े इन खेतों में मजददूरी करते हैं और स्ताह में एक दिन गंभीर तरीके से बीमार पड़ते हैं । यह खुलासा 3 दिसंबर कको भकोपाल गैस त्ासदी कको याद करते हुए टॉबकसक ब्लूमस : इमपैक्टस ऑफ पेबसटसाइडस इन इमपेक्टस ऑफ फ्लोरीकलचर इंिसट्री इन तमिलनाडु , इंडिया रिपकोट्ड में किया गया है ।
रिपकोट्ड के मुताबिक 09 वर्ष से 13 वर्ष की उम्र तक के बच्ों में सिरदर्द , तिचा संबंधी
परेशानियां , उलटी , थकान , नींद की कमी , झटके , सुसती , बुखार और शरीर दर्द जैसी समसयाएं पैदा हको रही हैं । वहीं , खेतों में काम करने वाले करीब एक तिहाई बच्ों ने अपने जवाब में कहा कि स्ताह में वे एक बार जरूर बीमार पड़ते हैं । पेसटीसाइड एकशन नेटवर्क एशिया पैसिफिक ( पीएनएपी ), सकोसाइटी फॉर रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट ( एसआरईडी ) और पैन इंडिया द्ारा जारी संयुकत अधययन में बताया गया है कि तमिलनाडु में फ्लोरिकलचर फामषों में अतयवधक खतरनाक कीटनाशकों
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