eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 18

मजहबी सरकार के लिए अछू त बने रहे दलित

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रामायण के रचयिता ऋषि वालमीवक कको अपना मानने वाले वालमीवक समाज के लकोग मैला ढकोने जैसा घृणित कार्य करते हैं कयोंकि इनहें किसी और जगह काम या नौकरी नहीं दी जाती थी । दशकों से इन लकोगों कको घाटी की नागरिकता तक नहीं मिली है । जबकि इसकी शुरूआत अचछे जीवन के वादे से शुरू हुई थी , लेकिन िको वादा कभी पदूरा नहीं हुआ ।

मजहबी सरकार के लिए अछू त बने रहे दलित

ककोई भी सरकार , चाहे वह कितनी भी विशेष कयों न हको यह कैसे कह सकती है कि उसके राजय में दलित समाज सिर्फ सफाई का ही काम कर सकता है ? सफाई के अलावा अनय कार्य करने के लिए संवैधानिक अधिकार से सिर्फ धारा-370 के कारण दलित पदूण्सतया वंचित हको गया था । देखा जाए तको इसी मानसिकता का विरकोध करने के लिए बाबा साहब डॉ भीमराव
अमबेिकर ने अपनी पदूरी जिंदगी संघर्ष करते हुए बिता दी । डॉ अमबेिकर का सपषट मानना था कि देश के हर वयबकत कको अपनी यकोगयता और रुचि के अनुसार काम चुनने का अधिकार हकोना चाहिए । लेकिन जम्मू-कशमीर सरकार ने राजय में रहने वाले हजारों दलितों कको बंधक बनाकर उनहें सिर्फ मैला उठाने के लिए बाधय किया ।
यह जम्मू-कशमीर की कार्यपालिका का ही कारनामा रहा , जिसने भारत के संविधान में एक नया अनुचछेद 35ए डाल दिया और इसकी खबर भारतीय संसद कको भी नहीं लगने दी । नए अनुचछेद के माधयम से यह वयिसरा की गई कि सरायी निवासियों के समबनध में राजय सरकार जको भी नियम-कानदून बनाएगी , ( चाहे वह संविधान के खिलाफ ही कयों न हको ), उसे असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकेगा । और फिर मजहबी राजय सरकारों ने मुबसलम बहुल राजय में अपने हितों कको पदूरा करने के लिए सरायी निवासी की परिभाषा और अवधारणा कको अपने
हिसाब से तय किया और उसका इसतेमाल दलित समाज के शकोषण व दमन के लिए किया । डॉ अमबेिकर का कहना था कि देश में हर किसी कको अपनी यकोगयता और रुचि के अनुसार काम चुनने का अधिकार हकोना चाहिए । लेकिन वासतविकता में ऐसा नहीं हुआ और न ही राजय ने इस समबनध में कभी विचार करने की जरुरत महसदूस की । कुछ ऐसी ही बसरवत उन दलित नागरिकों की भी हुई , जको पाकिसतान से भाग कर राजय में आकर बसे गए थे ।
सितंत्ता के बाद देश में कई दलित नेता पैदा हुए । लेकिन किसी ने भी दलितों की तरफ धयान देने की जरुरत नहीं महसदूस की । दलित नेताओं ने राजय के दलितों की जिस तरह अनदेखी की , उसका नकारातमक परिणाम राजय में रहने वाले दलितों कको भुगतना पड़ा । उनहें आधार कार्ड तको मिला लेकिन उनहें अपने ही देश में एक शरणारटी की तरह जीने के लिए बाधय हकोना पड़ा ।
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