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शुद्धकोधन ने उनहें महामाया का सिप्न सुनाया और पदूछा- ' मुझे इसका अर्थ बताएं । ब्ाह्मणों का उत्र था- महाराज , निश्चंत रहिये । आपके यहां एक पुत् हकोगा । यदि वह घर में रहेगा तको चरिितटी राजा हकोगा ; यदि गृह तयाग कर सनयासी हकोगा तको वह बुद्ध - संसार के अंधकार का नाश करने वाला हकोगा ।
यह घटना इसलिये भी महतिपदूण्स है कयोंकि डा . आंबेडकर ने इसे सच माना । इससे सपषट है कि यदि वह ब्ाह्मणों , देवताओं , सिप्न विज्ान के विरुद्ध हकोते तको वनबशचत रूप से इस घटना कको अमानय कर देते । ऐसे में जको नव- बौद्ध हर मसले पर ब्ाह्मणों कको दकोष देते हैं
उन पर प्रश्न पैदा हको जाते हैं । डा . अंबेडकर यह भी मानते हैं कि सिद्धार्थ कको बचपन में वेदादि ग्रंथों की संपदूण्स शिक्ा भी दी गयी थी । उनहोंने लिखा है कि जको कुछ वे ( आठ ब्ाह्मण ) जानते थे , जब वे सब सिखा चुके , तब शुद्धकोधन ने उवदच् देश के उच् कुलकोतपन्न प्रथम ककोवट के भाषाविद् तथा वैयाकरण , वेद , वेदांग तथा उपनिषदों के पदूरे जानकार स्बवमत् कको बुला भेजा । उसके हाथ पर समर्पण का जल सिंचन कर शुद्धकोधन ने स्बवमत् कको ही वशक्ण के वनवमत् सिद्धार्थ कको सौंप दिया । वह उसका ददूसरा आचार्य था । उसकी अधीनता में सिद्धार्थ ने उस समय के सभी दर्शन शासत्ों पर अधिकार
कर लिया ।
डा . आंबेडकर के ही श्दों में यह सिद्ध हको जाता है कि बौद्ध धर्म के पदूि्स ही वेदादि ग्रंथ थे । सिद्धार्थ के पीपल वृक् के नीचे ज्ान प्रा्त करने के पशचात ही बौद्ध धर्म अबसतति में आया । जको वेद ना हकोते इसके पदूि्स तको सिद्धार्थ ने इन शासत्ों की बचपन में शिक्ा ली ऐसा डा . आंबेडकर का का लिखना झदूठा हको जाता । अब निर्णय इन नव-बौद्ध भाषा विज्ानविदों ककको करना है कि वह कया सच मानेंगे । डा . आंबेडकर के नाम अपनी झदूठ की दुकान चलाना और डॉ आंबेडकर की लिखी बातों कको नकारना साथ-साथ नहीं हको सकता है । �
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