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स्िंत्रता संग्राम का तारापुर गोलीकांड

राष्टीय ध्वज फहराते हुए 34 वीर हुए र्हीद

जयराम विपलव

दे को आजादी कितनी कुबा्णमन्यों के बाद

हासिल हुई है , इसका अंदाजा शा्यद नई
पीढी को नहीं होगा । इसमें उनका दोष भी नहीं है । वे आजाद भारत में पैदा हुए हैं और बिलकुल अलग परिवेश में जी रहे हैं । इन 70 िषषों में काफी कुछ बदल चुका है । लेकिन उनहें इस बारे में बता्या जाना चाहिए कि ्यह आजादी कितनी मुसशकलों का सामना कर हमें हासिल हुई है ?
अगर सितंत्ता सेनामन्यों की बात करें तो हम इतिहास की पुसतकों में , फिलमों में , गानों में और सरकारी माध्यमों में चर्चित नामों को तो जानते है लेकिन सैकड़ों क्रांतिवीरों के बलिदान के बारे में नहीं जानते हैं जो आज आजादी के 70 साल बाद भी कहीं गुमनामी के अंधेरे में खोए हुए हैं । उनहें ्या तो भुला मद्या ग्या है ्या फिर वे हामश्ये पर डाल दिए गए । कई सेनामन्यों का तो कुछ अता पता भी नहीं मालूम क्योंकि उनके बारे में कभी कुछ जानने और बताने की कोशिश ही नहीं की गई ।
आप और हम सभी जमल्याँवाला बाग़ की घटना को जानते हैं लेकिन शा्यद किसी को पता हो भी ्या न हो कि आजादी की लडाई में बिहार के तारापुर का गोलीकांड कितनी महतिपूर्ण घटना थी । इस घटना की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी , शा्यद उतनी हो नहीं पाई है । आपको बता दें कि तारापुर बिहार के मुंगेर जिले का एक अनुमंडल है । ्यह कसबानुमा शहर तारापुर 15 फरवरी 1932 को मब्मटश हुकूमत विारा हुए भीषण नरसंहार के मल्ये प्मसद है । आजादी के दीवाने 34 वीरों ने तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहाराने के संकलप को पूरा करने के लिए सीने पर गोमल्यां खा्यी थीं और वीरगति को प्ापत हुए थे ।
15 फरवरी 1932 का वो बलिदानी दिन
तारापुर ही नहीं समूचे भारतवर्ष के लिए गौरव का दिन है जब क्रांतिकारर्यों के धावक दल ने थाना पर ' तिरंगा ' फहराते हुए जान की बाजी लगा दी थी । राष्ट्रीय झंडा फहराने के क्रम में भारती्य सितंत्ता आनदोलन का दूसरा सबसे बडा बलिदान “ तारापुर ” की धरती ने अपने 34 सपूतों की शहादत दी थी ।
वीर बलिदामन्यों की धरती ‘ तारापुर ’ ( मुंगेर , बिहार ) में रा्ट्रवाद का अंकुर सन 1857 की ऐतिहासिक क्रांति के सम्य से ही फूटने लगा था और बंगाल से बिहार की विभाजन के बाद वह अपना आकार लेने लगा था । विभाजित बिहार में कांरिेसी का्य्णकर्ताओं और क्रांतिकारर्यों का गढ बन ग्या था । इसका संचालन ढोल पहाडी से लेकर देवधरा पहाडी तक हुआ करता था । सितंत्ता आंदोलन के दौरान तारापुर का हिमाल्य ‘ ढोल पहाडी ’ इन्डियन लिबरेशन आमटी का शिविर था जिसका संचालन क्रांतिकारी बिरेनद्र सिंह करते थे , जिनको क्रसनतकारी भाई प्यार से बीरन दादा कहते थे । इनके प्मुख सहा्यक डॉ भुवनेशिर सिंह थे । ्यहाँ के शिविर में दर्जनों ऐसे क्रासनतकारी थे जो अपने क्रांतिकारी नेता के एक इशारे पर देश की आजादी के लिए जान हथेली पर लेकर घूमते थे । ढोल पहाडी शिविर का क्रांतिकारी दसता मब्मटश सरकार की मुखबिरी करने वाले गद्ारों को सजा देने के साथ-साथ गोला-बारूद-हमथ्यार खरीदने के लिए इलाके के धनाढ्य लोगों से रुप्ये – पैसे की सहा्यता
iQjojh 2022 दलित आं दोलन पत्रिका 49