eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Seite 49

की गई है । कुछ ने इसका समर्थन किया है और कुछ ने इस प्रयत्न पर जानबूझकर पर्दा डाल दिया है । कुछ लोग समझ पाने में सफल रहे हैं कि जात-पांत का मूल कहां हो सकता है । वे कहते हैं , '' यदि हम मूल के प्रति अपनी स्ेह भावना पर नियंत्ण नहीं कर सकते तो हमें उसके बहुवचन रूप अर्थात् ' जात-पांत के मूल ' का प्रयोग करना चाहिए ।'' वैसे भारत में जात-पांत के मूल के बारे में कोई उलझन पेश नहीं हुई है , जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं कि सजातीय विवाह ही जातपांत का एकमात् कारण है और जब में जाति के मूल की बात कहता हूं तो इसका अर्थ सजातीय विवाह प्रथा की क्रियाविधि के मूल से हैं ।
किसी समाज में वयसकियों की अतिसूक्म अवधारणा को इतने शसकिशाली ढंग से प्रचारित करना-मैं गंदगी उछालना कहने जा रहा था । यह राजनीतिक भाषा में कोरी बकवास है । यह बात नगणय है कि वयसकि मिलकर समाज बनाते
हैं । समाज सर्वथा वगषों से मिलकर बनता है ; इसमें वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर बल देना अतिशयोसकि हो सकती है , परंतु यह सच है कि समाज में कुछ तनसशचि वर्ग होते हैं । आधार भिन्न हो सकते हैं । वे वर्ग आर्थिक , आधयासतमक या सामाजिक हो सकते हैं , लेकिन समाज का प्रतयेक वयसकि किसी न किसी वर्ग से संबंद्ध होता है । यह एक शाशवि सतय है और आरंभिक हिंदू समाज भी इसका अपवाद नहीं रहा होगा । जहां तक हम जानते हैं , वह अपवाद नहीं था । यदि हम इस सामानय नियम को धयान में रखते तो पाते हैं कि जातपांत की उतपति के अधययन में यह बहुत उपयोगी ततव साबित हो सकता है , कयोंकि हम यह तनसशचि करना चाहते हैं कि वह कौन सा वर्ग था , जिसने सबसे पहले अपनी जाति की संरचना की । इसीलिए वर्ग और जाति एक-दूसरे के दो रूप है । फर्क सिर्फ यह है कि जाति अपने को सजातीय परिधि में रचने वाला वर्ग है ।
जातिप्रथा के मूल का अधययन हमारे प्रश्नों का उत्तर दे सकता है कि वह कौन-सा वर्ग है , जिसने इस परिधि का सूत्पात किया , जो इसका चक्रवयूह है ? यह प्रश्न बहुत कौतूहलजनक है , परंतु यह बहुत प्रासंगिक है और इसका उत्तर उस रहसय पर से पर्दा हटाएगा कि पूरे भारत में जातिप्रथा कैसे पनपी और दृढ़ होती गई । दुर्भागय से इस प्रश्न का सीधा उत्तर मेरे पास नहीं हैं । मैं इसका परोक्ष उत्तर ही दे सकता हूं । मैंने अभी कहा है कि विचाराधीन रीति- रिवाज हिंदू समाज में प्रवाहित हैं । िरयों को यथार्थ बनाए रखने के लिए यह आवशयक है कि कथन को सप्ट किया जाए , ताकि इसकी वयापकता पर प्रकाश डाला जा सके । यह प्रथा अपनी पूरी दृढ़ता के साथ केवल एक जाति अर्थात रिाह्मणों में प्रचलित है , जो हिंदू समाज की संरचना में सववोच् सथान पर है और गैर- रिाह्मण जातियों ने इसका केवल अनुसरण किया , जहां इसके पालन में न तो उतनी दृढ़ता है और न संपूर्णता ।
यह महत्वपूर्ण िरय हमारे सममुख महत्वपूर्ण जानकारी प्रसिुि कर सकता है । यदि गैर- रिाह्मण जातियां इस प्रथा का अनुसरण करती हैं , जैसा कि आसानी से देखा जा सकता है , तो यह प्रमाणित करने की कोई आवशयकता नहीं रह जाती कि कौन-सा वर्ग जाति-वयवसथा का जनमदाता है । रिाह्मणों ने कया अपने लिए एक परिधि बनाई और जाति की संरचना कर ली , यह एक अलग प्रश्न है , जिस पर किसी अनय अवसर पर विचार किया जाएगा , परंतु इस रीति-नीति पर कड़ाई से पालन और इस पुरोहित वर्ग द्ारा प्राचीन-काल से इस प्रथा का कड़ाई से अमल , यह प्रमाणित करता है कि वही वर्ग इस अप्राकृतिक संसथा का जनमदाता था । उसने अप्राकृतिक साधनों से इसकी नींव डाली और इसे जिंदा रखा ।
अब मैं अपने लेखन के तीसरे भाग पर आता हूं , जिसका संबंध पूरे भारत में जातपांत के उद्भव और विसिार से है । जिस प्रश्न का मुझे उत्तर देना है , वह यह कि देश के अनय गैर- रिाह्मण समुदायों में यह प्रथा कैसे फैली ?
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