eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 50

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इसके उत्तर में मेरा विचार है कि पूरे भारत में जातिप्रथा के प्रचलन से जयादा पीड़ादायक इसके उद्भव का प्रश्न है । जैसा कि मैं समझता हूं , इसका मुखय कारण यह है कि इसका विसिार और सूत्पात दो अलग-अलग बातें नहीं हैं । विद्ान इस बात पर सहमत हैं कि जातिप्रथा या तो भोले-भाले समाज पर कानून गढ़ने वालों ने नैतिकता का मुलममा चढ़ाकर थोप दी या फिर सामाजिक विकास की भकि भारतीय जनता में किसी नियम के अधीन पनपती रही ।
पहले मैं भारत के विधि-निर्माता के बारे में बताना चाहूंगा । हर देश में उसके विधि-निर्माता होते हैं , जो अवतार कहलाते हैं , ताकि आपातकाल में पापी समाज को सही दिशा दी जा सके । यही विधि-निर्माता कानून और नैतिकता की प्रतिसथापना करते हैं । भारत में विधि-निर्माता के रूप में यदि मनु का कोई अससितव रहा है , तो वह एक ढीठ वयसकि रहा होगा । यदि यह बात सतय है कि उसने समृति अथवा विध की रचना की तो मैं कहता हूं कि वह दुतःसाहसी वयसकि था और जिस मानवता ने उसके विधान को शिरोधार्थ किया , वह वर्तमान-काल की मानवता से भिन्न थी । यह अक्पनीय है कि जाति-विधान की संरचना की गई । यह कहना कोई अतिशयोसकि न होगी कि मनु ने ऐसा कोई विधान नहीं बनाया कि एक वर्ण को इतना रसातल में पहुंचा दिया कि उसे पशुवत बना दिया और उसको प्रताड़ित करने के लिए एक शिखर वर्ण गढ़ दिया । यदि वह क्रकूर न होता , जिसने सारी प्रजा को दास बना डाला , तो ऐसी क्पना भी नहीं की जा सकती कि वह अपना आधिपतय जमाने के लिए इतने अनयायपूर्ण विधान की संरचना करता , जो उसकी ' वयवसथा ' में साफ झलकता है ।
मैं मनु के विषय में कठोर लगता हूं , परंतु यह तनसशचि है कि मुझमें इतनी शसकि नहीं कि मैं उसका भूत उतार सककूं । वह एक शैतान की तरह जिंदा है , किंतु मैं नहीं समझता कि वह सदा जिंदा रह सकेगा । एक बात मैं आप लोगों को बताना चाहता हूं कि मनु ने जाति
के विधान का निर्माण नहीं किया और न वह ऐसा कर सकता था । जातिप्रथा मनु से पूर्व तवद्मान थी । वह तो उसका पोषक था , इसलिए उसने उसे एक दर्शन का रूप दिया , परंतु तनसशचि रूप से हिंदू समाज का वर्तमान रूप जारी नहीं रह सकता । प्रचलित जातिप्रथा को ही उसने संहिता का रूप दिया और जाति- धर्म का प्रचार किया । जातिप्रथा का विसिार और उसकी दृढ़ता इतनी विराट है कि यह एक वयसकि या वर्ग की धूर्तता और बलबूते का काम नहीं हो सकता । तर्क में यह सिद्धांत है कि रिाह्मणों ने जाति-संरचना की । मैंने मनु के विषय में जो कहा है , मैं इससे अधिक और नहीं कहना चाहता , सिवाय यह कहने के कि वैचारिक दृष्ट से यह गलत और इरादतन दुर्भावनापूर्ण है । रिाह्मण और कई बातों के लिए दोषी हो सकते हैं , और मैं तनतःसंकोच कह सकता हूं कि वे हैं भी , परंतु गैर-रिाह्मण अनय जन -समुदायों पर जातिप्रथा थोपना उनके बूते के बाहर की बात थी । अपने इस तरह के दर्शन द्ारा , हो सकता है उनहोंने अपने ही तरीके से इस प्रक्रिया को पनपने में सहायता की हो , परंतु अपनी क्षमता से वे अपनी योजना काया्षसनवि नहीं करा सकते थे । चाहे कोई
कितना भी गौरवशाली हो ! चाहे कोई कितना ही कठोर कयों न हों ! अपने ढंग से समाज को चलाने में वह प्रशंसित तो हो सकता है , किंतु यह सिलसिला जयादा दिन नहीं चलता । मेरी आलोचना की तीव्रता अनावशयक लग सकती है , पर मैं आपको विशवास दिलाता हूं कि यह असतय नहीं है । पुरातन पंथी हिनदुओं के मन में दृढ़ धारणा है कि हिंदू समाज किसी तरह जातिप्रथा की प्रणाली में ढल गया और यह संसथा शासत्ों ने बनाई है । यह विशवास केवल तवद्मान ही नहीं है , बल्क उसे इस आधार पर नयायसंगत भी ठहराया जाता है । यह ससथति सुखद हो सकती है , कयोंकि यह शासत्ों से जनमी है और शासत् गलत नहीं हो सकते । मैंने इस प्रकृति की विसंगतियों की ओर इस आधार पर ही धयान नहीं दिलाया है कि वैज्ातनकता के नाम पर धार्मिक सामानयिाएं थोप दी गईं , न ही मैं उन सुधारकों का पक्षधर हूं , जो इसके विरुद्ध है । यह प्रथा उपदेशों से बड़ी है और न ही उपदेश इसे उखाड़ सकते हैं । मैं इस प्रकृति की निससारता बताना चाहता हूं , जिसने धार्मिक प्रतिबंधों को वैज्ातनक कहकर ओढ़ रखा हैं ।
( जारी )
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