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परे तक समर्पण को दर्शाती है , कयोंकि इसमें पत्नीतव को साकार रूप दिया गया है , जैसा कि उमा ने अच्ी तरह उस समय सप्ट किया है , जब उनहोंने कहा था कि हे महेशवर , अपने पतिदेव के लिए नारी का समर्पण ही उसका सममान है , यही उसका शाशवि सवग्ष है । भावुकता में वह आगे कहती हैं कि मेरी धारणा है कि यदि आप मुझसे संतु्ट नहीं हैं तो मेरे लिए सवग्ष की कामना करना बेकार हैं । आजीवन वैधवय कयों सममाननीय है , मैं नहीं जानता , न ही मुझे कोई ऐसा वयसकि मिला है , जो इसकी प्रशंसा करता हो , हालांकि पालन करने वाले अनेकानेक हैं । बालिका विवाह की प्रशंसा में डा . केतकर कहते हैं , '' एक सच्े आसथावान सत्ी अथवा पुरुष को विवाह सूत् में बंधने के बाद अनय पुरुष-सत्ी से लगाव नहीं करना चाहिए , इस प्रकार की पतवत्िा न केवल विवाह के उपरोंत , बल्क विवाह पूर्व भी आवशयक है , कयोंकि चारित्र्य का केवल यही सही आदर्श है । किसी अपरिणता को पतवत् नहीं माना जा सकता , यदि वह उस वयसकि के अलावा जिससे उसका विवाह होने वाला है , किसी अनय वयसकि से प्रणय करती है । यदि वह ऐसा करती है तो यह पाप है । इसलिए एक लड़की के लिए यह अच्ा होगा कि कामवासना जाग्ि होने से पूर्व उसे यह पता होना चाहिए कि उसे किससे प्रेम करना है ? तब उसका विवाह किया जाए ।
ऐसी हवाई और कुतर्क की बातें यह तो प्रमाणित करती हैं कि ऐसी प्रथाओं को कयों सममातनि किया गया , परंतु हमें यह नहीं बतातीं कि ये रिवाज कैसे पड़े । मेरा यह मानना है कि इनको सममान देने का कारण ही यह है कि इनहें अपनाया गया । जिस किसी को भी 18वीं शताबदी के वयसकिवाद का थोड़ा-सा भी ज्ान होगा , वह मेरे कथन का सार समझ जाएगा । सदा से यह प्रथा रही है कि आंदोलनों का सववोपरि महत्व होता है । बाद में उनहें नयाय- संगत बनाने के लिए और उनहें नैतिक बल देने के लिए उनहें दार्शनिक सिद्धांतों का संबल दे दिया जाता है । इसी तरह मैं निवेदन करता हूं
कि इसी कारण इन रिवाजों की प्रशंसा की गई , कयोंकि इनके चलन को प्रोतसाहन देने के लिए प्रशंसा की जरूरत थी । प्रश्न यह है कि ये कैसे बढ़े ? मेरा विचार है कि जाति-संरचना में इनकी आवशयकता थी और उनको लोकप्रिय बनाने के लिए सिद्धांतों की बैसाखी पकड़ा दी गई । हम जानते हैं कि ये रिवाज कितने क्रकूर , क्टकारी और घातक हैं । रिवाज साधन मात् हैं , जबकि उनहें आदर्श घोषित किया गया , परंतु यह हमें परिणामों के बारे में भ्रमित नहीं कर सकते । सरलता से कहा जा सकता है कि साधनों को आदर्श बना देना आवशयक होता है और इस मामले में तो खासतौर से उनहें भारी प्रेरणा देकर उतसातहि किया जाता है । साधन को साधय मान लेने में कोई हर्ज नहीं है , किंतु हम अपने साधन की प्रकृति नहीं बदल सकते । आप कानून बना सकते हैं कि सभी बिल्ियां- कुत्ते हैं , जैसे अप किसी साधन को उद्देशय मान सकते हैं , परंतु आप साधन की प्रकृति में
परिवर्तन नहीं कर सकते । अितः आप बिल्ियों को कुत्ते नहीं बना सकते । ठीक ऐसे ही साधन को साधय मान सकते हैं । इसी कारण मेरा यह कहना ठीक है कि साधन और साधय को एकाकर कर दियाजाए , परंतु यह कैसे उचित ठहराया जा सकता है कि जातिप्रथा और सजातीय विवाह प्रथा के लिए सतीप्रथा , आजीवन विधवा अवसथा और बालिका विवाह , विधवा सत्ी , और विधुर पुरुष की समसया के समाधान हैं । सजातीय विवाह-वयवसथा को बनाए रखने के लिए ये रिवाज आवशयक हैं , जबकि सजातीय विवाह प्रथा के अभाव में जातिप्रथा का अससितव बने रहना संदेहासपद हैं ।
भारत में जातिप्रथा के प्रचलन और संरक्षण की क्रियाविधि पर विचार करते हुए अगला प्रश्न यह है कि इसकी उतपतत्त कहां से हुई ? इसके मूल का प्रश्न एक कड़वा प्रश्न है और जात-पांत के अधययन में इसी दुखद अवहेलना
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