eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Página 47

यह जाति के हित में है कि गृहसथ रहे । समसया केवल यह है कि उसे जाति में से ही पत्नी सुलभ कराई जाए । शुरू में इसमें कठिनाई होती है , कयोंकि जातियों में सत्ी और पुरुष का
अनुपात एक-एक का है । इस तरह किसी के दोबारा विवाह की गुंजाइश नहीं होती , कयोंकि जब जातियों की परिधियां बनी होती हैं तो विवाह योगय पुरुषों और ससत्यों की संखया पूरी तरह संतुलित होती है । इन परिससथतियों में विधुर को जाति में रखने के लिए उसका पुनर्विवाह उन बालिकाओं से किया जा सकता है , जो अभी विवाह योगय न हों । विधुरों के लिए यह यथा संभव उपाय है । इस प्रकार वह जाति में बना रहेगा । इस प्रकार उनके जाति से बाहर निकलने और उनकी संखया में कमी को रोका जा सकेगा और सजातीय विवाह वाले समाज में नैतिकता भी बनी रहेगी ।
यह सप्ट है कि ऐसे चार तरीके हैं , जिनहें अपनाने से सत्ी-पुरुषों में संखया का अनुपात बनाए रखा जा सकता है - ( 1 ) सत्ी को उसके मृत पति के साथ सती कर दिया जाए , ( 2 ) उसे आजीवन विधवा रखा जाए , जो जलाने से कुछ कम पीड़ादायक है , ( 3 ) विधुरों को रिह्मचर्य व्रत का पालन करने को बाधय किया जाए और ( 4 ) विधुर का ऐसी लड़की से विवाह कर दिया जाए , जिसकी आयु अभी विवाह योगय न हों । हालांकि मेरे उपरोकि विचार के अनुसार विधवा को जलाना और विधुर पर रिह्मचर्य व्रत थोपना सजातीय विवाह को बनाए रखने क लिए समूह के प्रयत्नों के प्रति संदेहासपद सेवा होगी , लेकिन जब साधनों को शसकि के रूप में सविंत् किया जाता है अथवा उनहें गतिमान कर दिया जाता है , तो वे लक्य बनते हैं । तब फिर वे साधन कौन सा लक्य प्रापि करते हैं । वे सजातीय विवाह की वयवसथा को जारी रखते हैं , जबकि विभिन्न परिभाषाओं के हमारे विशिेरण के अनुसार सजातीय विवाह और जाति एक ही बात है । अितः इन साधनों का अससितव और जाति समरूप हैं तथा जाति में इन साधनों का समावेश है ।
मेरे विचार में जाति-वयवसथा में यह जाति की सामानय क्रियाविधि है । अब हम अपना धयान इन उच् सिद्धांतों से हटाकर हिंदू समाज में तवद्मान जातिप्रथा और उसकी क्रियाविधि
की जांच में लगाएं । मैं तनतःसंकोच कह सकता हूं कि अतीत के रहसयों को खोलने वालों के मार्ग में अनेक कठिनाइयां आती हैं और तनतःसंदेह भारत में जाति-वयवसथा अति प्राचीन संसथा है । इन हालात में यह और भी जविंत यथार्थ है कि जहां तक हिनदुओं का संबंध है , उनके बारे में कोई आधिकारिक या लिखित संकेत नहीं हैं तथा भारतीयों का दृष्टकोण ऐसा बन गया है कि वह इतिहास लेखन को मूर्खता मानते हैं , कयोंकि उनके लिए जगत तमरया है , लेकिन ये संसथाएं जीवित रहती हैं , यद्तप चिरकाल तक इनका लिखित प्रमाण नहीं रहता और उनके रीति-रिवाज व नैतिक मूलय अवशेषों की भांति अपने आप में एक इतिहास हैं । हम अपने कर्तवय में सफल होंगे , यदि हम अतिरेक पुरुष और अतिरेक सत्ी से संबंधित समसयाओं का हिनदुओं द्ारा जो निदान किया गया है , उसकी जांच करें ।
सतही तौर पर देखने वाले वयसकि को हिंदू समाज की सामानय क्रियाविधि जटिल लगे , किंतु वह ससत्यों से संबंधित तीन असाधारण रीतियां प्रसिुि करती हैं , ये हैं -
-सती या विधवा को उसके मृत पति के साथ जलाना ।
-थोपा गया आजीवन वैधवय , जिसके अंतर्गत एक विधवा को पुनतःतववाह करने की आज्ा नहीं हैं । -बालिका विवाह । संनयास के बाद भी विधु में विकट लिपसा होती हैं , परंतु कुछ मामलों में यह शुद्ध मानसिक कारणों से ही संभव है । जहां तक मैं समझता हूं , आज तक इन प्रथाओं के उद्भव की कोई वैज्ातनक वयाखया सामने नहीं आई है । अनेक दार्शनिक सिद्धांत इन प्रथाओं की प्रति्ठा में प्रतिपादित किए गए हैं , परंतु कहीं से इनके उद्भव और अससितव का संकेत नहीं मिलता । सती सममाननीय है ( ए . के . कुमार सवामीतः सतीतः ए डिफेंस ऑफ द ईसटन्ष वीमेन इन द सोशियोलोजिकल रिवयू , वो्यूम , 6,1913 ) कयोंकि यह पति-पत्नी के बीच शरीर और आतमा की संपूर्ण एकातमकता और शमशान से
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