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डॉ आंबेडकर और जाप्त प््ा -2
डॉ भीमराव आंबेडकर
( गतांक ्से आगे )
वह समाज के लिए कितना ही
महत्वपूर्ण हो , सजातीय विवाह इससे
भी अधिक महत्वपूर्ण है और इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए , जो इन दोनों लक्यों की पूर्ति करे । ऐसी परिससथतियों में उसे भी विधवा की तरह आजीवन विधुर रहने के लिए बाधय या मेरे विचार में ऐसा करने के लिए राजी किया जा सकता है । यह समाधान तब्कुि मुसशकि नहीं है , कयोंकि कुछ बिना विवश किए भी आतम-संयम बरत सकते हैं या वे इससे भी चार कदम आगे बढ़कर रिह्मचर्य व्रत का पालन कर सकते हैं , लेकिन मानव प्रकृति को देखते हुए ऐसी अपेक्षा आसानी से पूर्ण नहीं हो सकेगी । दूसरी ससथति में संभव है कि ऐसा वयसकि समूह की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने पर उसके नैतिक सिद्धांतों के लिए खतरा बन सकता है ।
दूसरे दृष्टकोण से देखने पर यद्तप रिह्मचर्य व्रत उन मामलों में आसान है , जहां इसे सफलता से अपनाया जाता है , लेकिन फिर भी जाति की भौतिक सुख-समृद्धि के लिए लाभदायक नहीं है । यदि वह सही अथषों में रिह्मचर्य व्रत का पालन करता है और सांसरिक सुखों का तयाग कर देता है , तो वह जाति के नैतिक मू्यों या सजातीय विवाह के लिए खतरा नहीं होगा , जैसा कि उसके सांसारिक जीवन बिताने पर होता । जहां तक भौतिक सुख-समृद्धि का प्रश्न है , रिह्मचारी की तरह जीवनयापन करने वाला वयसकि जला दिए गए वयसकि के समान है । प्रभावी सौहार्दपूर्ण जीवन सुतनसशचि करने के लिए सदसयों की निर्धारित संखया होनी चाहिए ।
विधुरों पर रिह्मचर्य थोपना सैद्धांतिक और वयावहारिक , दोनों दृष्टयों से विफल रहा है ।
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