eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Página 45

पृ्ठ १०० पर लिखा है-सवर्ण हिनदू और आवरण अछूत यानी जो अछूत थे , वे अवर्ण थे । शूद्र कभी भी असपृशय नहीं था , इसलिए शूद्र भी सवर्ण थे । विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के समय धर्म एवं संसकृति संरक्षण का उत्तरदायितव रिाह्मणों पर एवं देश किए सीमा एवं जान-धन किए रक्षा का उत्तरदायितव क्षतत्यों पर था । वह ही प्रमुखता के साथ विदेशी आक्रांताओं के साथ उनके आक्रमण का उत्तर भयानक प्रतिशोध के रूप में युद्ध से देते थे । परिणामसवरूप उन विदेशी तुर्क , मुससिम और मुग़ि आक्रांता शासकों के आक्रोश , अनयाय , अतयाचार एवं शत्ुिा का प्रमुख शिकार यही धर्म और संसकृति रक्षक रिाह्मण एवं रा्ट्र रक्षक क्षतत्यों को होना पड़ता था । वासिव में विदेशी आक्रांताओं के घृणा एवं आक्रोश के कारण परासि होने पर रिाह्मण एवं क्षतत्यों को खोज खोज कर उतपीतड़ि किया जाता था ।
हिनदू समाज में वैदिक काल से लेकर मधयकाल के पहले तक सथायी रूप से असपृशयिा कभी नहीं थी । डलॉ आंबेडकर ने अछूत कौन और कैसे ? पृ्ठ ४९ एवं ५० पर लिखा है कि रिाह्मण , क्षतत्य , वैशय और शूद्र सभी दास होते
थे । दास प्रथा अनुलोम क्रम से था । वैसे भी महाभारत का वह प्रकरण जिसमें भगवान श्ी कृ्ण सवयं अतिथियों के भोजन करने के बाद उनके जूठे पत्तल उठाये थे । हिनदू लोक जीवन में असथायी असपृशयिा का पाया जाना अतयंि साधारण बात है , किनिु सथायी असपृशयिा तो अनतयि , चांडाल एवं शूद्रों के साथ भी नहीं था । कोई वयसकि सथायी रूप से असपृशय नहीं हो सकता है । जब तक कोई वयसकि या समूह किसी कार्य या परिससथति विशेष में होता है , तभी तक उसे असपृशय माना जाता है । शौचादि के समय वयसकि के साथ असपृशयिा की ससथति प्रायतः प्रतिदिन होती है किनिु स्ान के बाद वह असपृशयिा मुकि हो जाता है । सूतक काल में समपूण्ष परिवार ही दस दिनों तक असपृशय रहता है । इसी प्रकार ससत्यां अपने मासिक धर्म काल में असपृशय मानय हैं , किनिु उसके उपरांत वह धर्मादि अनु्ठान इतयातद में सामानय रूप से भागीदारी करती हैं ।
हिनदू संसकृति में अपतवत्िा एवं असपृशयिा दो अलग अलग विषय हैं । हिनदू धर्म के दस ततवों का विवरण मनुसमृति के 92 शिोक में इस प्रकार है-धृति ( धैर्य ), क्षमा , दम
( तपसया ), असिेय ( चोरी न करना ) शौच ( पतवत्िा ) इसनद्रय तनग्ह , ज्ान , विद्ा , सतय तथा अक्रोध ( अहिंसा ) यानी हिनदू धर्म में शौचम अर्थात पतवत्िा का सथान अतयंि महतवपूर्ण है । ऐसे में पतवत्िा की मानयिा असवच् वृत्ति ( मैला ढोना , सफाई कर्म , चर्म कर्म , गोमांसाहार ) इतयातद से बुरे ढंग से प्रभावित थी । यही कारण है कि मधयकाल में विदेशी शासकों द्ारा धर्माभिमानी एवं कट्टर हिनदुओं से बलपूर्वक असवच् वृत्ति करवाकर उनहें असपृशयिा की श्ेणी में धकेल दिया । इस प्रकार धर्म एवं संसकृति रक्षा के नाम पर रिाह्मणों एवं जन-धन एवं सीमा सुरक्षा के नाम पर क्षतत्यों के साथ विदेशी शासकों द्ारा आक्रोशवश असवच् कार्य कराकर उनके हिनदू सवातभमान को तोड़ने का प्रयास किया गया । वासिव में हिनदू समाज ने अपतवत्िा एवं असपृशयिा में अंतर न करके एक चूक की और इसका परिणाम आज बिखरा हुआ हिनदू समाज विशव के सामने है ।
इसमें भी आशचय्ष नहीं कि दलित समबसनधि विषयों के विशेषज्ों , दलित विषय समबसनधि साहितयकारों एवं सवयं हिनदू दलित वर्ग के चिनिकों का इन तन्करवो से प्रारसमभक सामयिा की अपेक्षा भी नहीं है । दलितोतथान के वासितवक सिद्धानि का आधार समाजिक है , नकि आर्थिक । समाजिक सिद्धानि के आधार पर दलित समसया के निदान का यह एक नूतन सिद्धानि है । चिनिकों एवं विचारकों के लावा हिनदू समाज की रोचक प्रतिक्रिया की क्पना किया जा सकता है । आज भी समाज कानून से नियंतत्ि होता है किनिु चलता तो समाजिक बल से ही है । सामाजिक बल को प्रभावित करने के लिए उसमें हसिक्षेप करना एवं हिनदू दलित समाज के पक्ष में सामाजिक बल को हसिानिरित कराना , इस शोध का एक उद्देशय है । यदि हिनदू समाज में हिनदू दलितो के पक्ष में सामाजिक बल को हसिानिरण करनें में हम सफल हुए तो आने वाले समय में अमानवीय , तिसकृि एवं भेदभावयुकि जीवन जीने वाले दलित समाज में एक सवतण्षम प्राितः होगा । �
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