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जंगलों में शरण लिया हो और फिर कभी बहार ही न आ सका हो ।
अनुसूचित जाति के लिए आवशयक आधार असपृशयिा एवं असवच् वयवसाय है । प्रश्न उठता है कि कया हिनदू समाज में असपृशयिा थी ? और दूसरा प्रश्न है कि कया हिनदू समाज में असवच् कार्य थे ? इन दोनों प्रश्नों के यथोचित उत्तर से कम से कम वर्तमान हिनदू समाज में दलित कौन ? का सवरुप सप्ट हो जायेगा । डलॉ बी आर आंबेडकर की पुसिक अछूत कौन और कैसे का छठा पैराग्ार में सप्ट है कि जहा तक अनतयिों की बात है , उनके बारे में जो कुछ हम जानते हैं , वह उनके अछूत होने की बात का खंडन करने के लिए पर्यापि हैं । डलॉ आंबेडकर ने आगे उसी पुसिक पर पृ्ठ १०० के अंतिम पैराग्ार में लिखा कि पहली बात यह हैं कि मनु के समय में अछूतपन नहीं था । उस समय केवल अपतवत्िा थी । चांडाल ही केवल अपतवत् था । डलॉ आंबेडकर के इस कथन के अनुसार अनतयि , चांडाल एवं सुद्रडी असपृशय नहीं थे । डलॉ आंबेडकर ने असपृशयिा के लिए मात् गो- मांसाहार को उत्तरदायी ठहराया । उनहोंने उसी पुसिक अछूत कौन और कैसे के अंतिम पृ्ठ १०६ के पांचवे पैराग्ार में उ्िेख किया है कि गो मांसाहार ही अछूतपन के मूल में निहित है । यदि हम गो मांसाहार निषेध को अपने चिंतन का आधारशिला बनाये तो इसका मतलब होता है कि अछूतपन की उतपतत्त का गोबध बढ़ तथा गो मांसाहार निषेध से सीधा समबनध होना चाहिए । इससे यह िरय तो प्रमाणित हो गया की गो बध एवं गो कर्म इतयातद असपृशयिा के मूल में था और इसलिए इसे असवच् वयवसाय घोषित करने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए । ऐसे प्रकरण में चिंतको को वयसकिगत या राजनीति से प्रेरित क्रियाकलापों पर विचार करना औचितयहीन मानना भी चाहिए ।
वर्तमान दलित समाज के सनदभ्ष में यह तथा अब और महतवपूर्ण हो गया है कि हिनदुसथान में असपृशयिा एवं असवच् पेशा ही उत्तरदायी है , तो इसे विद्ानों एवं सामाजिक विषय के चिंतकों को वरीयता पर चिंतन करने किए
आवशयकता है । डलॉ आंबेडकर के तन्कर्ष में इसका विवरण यानी असपृशयिा का ६०० ईसवी पूर्व में प्रारमभ होना कैसे मानते थे , इससे यह सप्ट होता है कि वैदिक काल गो-मांसाहार की बातें शरारतपूर्ण एवं प्रतिशोध की भावना से हिनदू समाज को विभ्रमित करने का एक प्रयास है । संसकृि भाषा के शबदकोश शबद कलपररूम में गो का इसनद्रय यानी अंग शबद से अर्थ वयकि किया गया था । लेकिन पंडित तारक नाथ जो कलकत्ता संसकृि अकादमी एक सदसय थे , उनके द्ारा अंग्ेिी शासन काल में संसकृि का शबदकोष वाचसपतयम तीन हजार रुपया देकर लिखवाया गया था । वाचसपतयम में गो शबद का अर्थ गाय लिखा गया है । इस आधार पर गोध्न शबद का अर्थ शबदक्पद्रुम के आधार पर इसनद्रयों का और वाचसपतयम के अनुसार गाय की हतया से होता है । वेदों में अनेकों सथान पर गोध्न शबद का प्रयोग है । इसलिए इस प्रकार के प्रायोजित भ्रम की संभावना सदैव बनी रही है ।
हिनदुसथान में तुकषों , मुसलमानों एवं मुगलों के आक्रमण एवं उनके शासन के पूर्व अनेकों विद्ान विदेशी यातत्यों ने पूरे देश में घूम घूम कर वहां की संसकृति , सभयिा , धर्म , रहन-सहन , वयवसाय , कला इतयातद का बढ़ा-चढ़ा कर रोचक ढंग से विवरण प्रसिुि किया । किनिु किसी विदेशी यात्ी ने भारत में असपृशयिा , असपृशय जातियां या समुदाय अथवा असवच् वयवसाय जैसे धर्म-कर्म , गोचर्म , कर्म , मैला ढोना , सफाई कर्मादि का एक भी जगह उ्िेख नहीं किया । मैगसथनीज गयारहवीं सदी में हिनदुसथान आया था । उसने भी प्रमुख विषयों पर अपना संसमरण लिखा किनिु उसके भी संसमरण में कहीं भी असपृशयिा और असवच् पेशों का उ्िेख नहीं है । इसका हम तातपय्ष लेते है कि हिनदुसथान में कम से कम मैगसथनीज के आने तक इस देश में असपृशयिा एवं असवच् वयवसाय नहीं थे । चर्म के सनदभ्ष में सुप्रसिद्ध डलॉ हमीदा खातून ने अपनी पुसिक अर्बनाइजेशन पृ्ठ -50 पर लिखा है कि हिनदू चमड़े का निषिद्ध एवं हेय समझते थे , लेकिन भारत के मुससिम शासकों ने उसके उतपादन के लिए और अधिक प्रयास किये थे ।
हिनदू और इसिातमक संसकृति में चर्म-कर्म के आधार पर भेद के सनदभ्ष में यह एक बुनियादी अवधारणा मानी जा सकती है । इसे इस प्रकार भी वयकि किया जा सकता है कि चर्म वयवसाय से इसिातमक समाज को आक्षेप नहीं था , किनिु हिनदुओं एवं हिनदू लोक जीवन में यह किसी भी मू्य पर मानय नहीं था ।
हिनदुसथान में मधय काल एवं उस काल का प्रभाव हिनदू संसकृति , हिनदू धर्म एवं हिनदुसथान पर कया था ? यह एक महतवपूर्ण शोध का विषय है । इसी शोध के तन्कर्ष पर दलित विषयक समसया का समाधान भी प्रापि हो सकता है । समृद्धिशाली , वैभवशाली एवं गौरवशाली महँ रा्ट्र हिनदुसथान पर जब विदेशी आक्रांताओं का आक्रमण होता था तो उसका प्रतयुत्तर तो समपूण्ष देश ही देता था , किनिु धर्म रक्षा के नाम पर रिाह्मण एवं देश के नाम पर क्षतत्य तचसनहि थे । हिनदू धर्म और संसकृति के आलोक में पूरा हिनदू समाज चार श्ेणी में विभकि था , जिसे वर्ण वयवसथा भी कहा जाता था । रिाह्मण , क्षतत्य , वैशय एवं शूद्र में विभकि समपूण्ष हिनदू समाज सवर्ण था । डलॉ आंबेडकर ने ही अपनी पुसिक अछूत कौन और कैसे के
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