eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Seite 43

बल की आवश्यकता

पृसठभूमि में सिद्धांत एवं तर्क का पर्याय रहेगा । डलॉ आंबेडकर की तीन पुसिक क्रमशतः शूद्रों की खोज , अछूत कौन और कैसे ? एवं जाति भेद का उच्ेद एवं डलॉ अमबेडकर के भाषण और लेख इतयातद पुसिकों एवं संकलनों की सहायता से सामाजिक क्षेत् में दलित विषयक समसया के सामाजिक समाधान का सिद्धांत प्रतिपादित किया जा सकता है ।
डलॉ आंबेडकर ने अपनी पुसिक शूद्रों की खोज ( समयक प्रकाशन , किब रोड , पसशचम पूरी नयी तद्िी ) के प्राककथन के दूसरे एवं तीसरे पैराग्ार में दो महतवपूर्ण विषय का उ्िेख किया है । प्रथम -मिसटर शेरिंग की
पुसिक ' हिनदू ट्राइबस एंड कासट , खंड-१ , पृ्ठ-१ ' पर लिखे पैराग्ार को उद्ेतित किया है । इसमें लिखा है कि आज शूद्र कहीं जाने वाली कुछ जनजातियां वासिव में कुछ और न होकर रिाह्मण एवं क्षतत्य हैं । द्रुतीय डलॉ आंबेडकर ने वर्तमान दलितों को एवं प्राचीनकाल के शूद्रों को अलग अलग माना है । उनहोंने सप्ट उ्िेख किया है कि यह तवतचत् लगता है कि उनके ( शूद्रों ) के वयवहार के लिए जो संहिता थी , वह आज भी सक्रिय बनी हुई है । और अब उसे निचले वर्ग ( दलित ) के सभी हिनदुओं पर लागू किया जाता है , जिनका शूद्रों से कोई लेनादेना नहीं है । आज तथाकथित शूद्र ( दलित ) मूल अर्थ में शूद्र न होते हुए भी इस संहिता के दायरे में आ गए । हिनदू विधिकारो में यदि समुचित बोध होता और वह यह समझ पाते कि मूल शूद्र आज के निम्नवगवीय ( दलित ) समझे जाने वर्ग से भिन्न थे तो दस शताबदी से जारी इस नरसंहार को टाला जा सकता था ।
डलॉ आंबेडकर ने सप्ट कर दिया कि वर्तमान दलित संवगवीय जातियां शूद्र नहीं हैं , इसलिए यह प्रश्न उठना सवाभाविक है कि वर्तमान दलित कौन ? डलॉ आंबेडकर ने शोधपरक अधययन के साथ अथक पररश्म से शूद्रों की खोज तो पूर्ण कर ली , लेकिन वर्तमान जाति विषयक समसया का समाधान तो दलितों की खोज या दलित कौन नामक विषय के अनावरण ही में था और यह विषय उनकी वयसििा एवं कार्य की वरीयतावश शेष रह गया । वासिव में वह अतयंि वयसि थे । उनहोंने अपनी पुसिक पाकिसिान अथवा भारत का विभाजन के दूसरे संसकरण का प्राककथन के प्रथम पैराग्ार को यही से प्रारमभ किया है-सभी के लिए सिरदर्द का कारण बन गयी पाकिसिान की समसया ने मुझे किसी और की अपेक्षा सबसे अधिक
वयतथि किया । मैं खेद के साथ कह रहा हूँ कि इसमें मेरा बहुत अधिक समय जाया हुआ , जिसके कारण मेरे कई सातहसतयक कायषों में विलमब हुआ और समयभाव में कई कार्य सथतगि करना पड़ा । आज दलित विषयक समसया के समाधान के लिए दलित कौन ? यह जान लेना आवशयक होगा और यदि यह मार्ग दर्शन भी श्द्धेय डलॉ आंबेडकर द्ारा ही प्रापि हो गया होता तो लमबे समय से इस दिशा में किये जाने वाले प्रयास अब तक फलीभूत हो गए होते ।
वर्तमान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानि दलित वर्ग के सूचीबद्धता के लिए भारत सरकार का नीति-तनदवेश पर दृष्टपात आवशयक है । अनुसूचित जाति के लिए और अनुसूचित जनजाति के लिए दो-दो आधार सुरक्षित हैं । अनुसूचित जाति के लिए दो बिंदु इस प्रकार है-प्रथम हिनदू समाज की वह जातियां , जिनके साथ असपृशयिा का वयवहार किया जाता है । तद्िीय हिनदू समाज की वह जातियां जो असवच् पेशे से समबंतधि है । इसके आलावा अनुसूचित जाति से शामिल करने के लिए कोई आधार नहीं है । इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति के लिए जो बिंदु आवशयक हैं , उनमें प्रथम तो ऐसी जातियां या समुदाय जिनका वनय उपज पर जीविकोपार्जन निर्भर हो और दूसरा यह कि वह सभी जातियां जो भारत सरकार द्ारा घोषित आदिवासी क्षेत् में निवास करते हैं । इसके अलावा यह भी अलग से कुछ आधार नहीं हैं । अब यदि हम इन आधारों का परीक्षण करे तो दलित कौन का उत्तर हमें स्वतः प्रापि हो जायेगा । वैसे जनजातियों के सनदभ्ष में यह तथा भी दुर्भागयपूर्ण हैं कि इतने घने एवं दुर्गम जंगलों तथा सथानों पर मानव पंहुचा कैसे होगा ? ऐसा तो नहीं कि किसी भयानक परिससथति में सभय मानव ने
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