eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 42

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दलितोत्ाि के लिए सामाजिक

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डलॉ

भीम राव रामजी आंबेडकर का कहना था कि हिनदुसथान के दलितों की ससथति प्राचीनकाल के शूद्रों , अनतयिों एवं चाणडािों से बदतर है , लेकिन वो अछूत तो नहीं थे । वासिव में हिनदुसथान में जाति के नाम पर दलितों के जिस वर्ग को समाज में पैदा किया , उस वर्ग की दयनीय ससथति , तिरसकृि जीवन एवं हिनदू समाज का उनके प्रति पूवा्षग्हयुकि , पूर्व निर्धारित मानसिकता , डलॉ आंबेडकर के चिंतन को सतयातपि करता है । सविंत्िा के बाद जो भी प्रयास हुए , उनके प्रतिफल तो मिले किनिु परिणाम अपेक्षा के अनुरूप या तो कम थे या मिले ही नहीं । इसका कारण सप्ट था , वह यह कि हमारे जो भी प्रयास हुए वह आर्थिक और राजनीतिक सिर पर दलित समाज की भागीदारी दिलाने की दिशा में हुआ । वासिव में दलित विषयक समसया की जड़ आर्थिक एवं राजनीतिक विषयों से आगे सामाजिक वयवसथा की जड़ में है । हम दलित वर्ग की दयनीय ससथति एवं उनके साथ समाज में हो रहरे दुवय्षवहार आज परोक्ष दिखाई देते हैं । इस सनदभ्ष में समाजशाससत्यों ने जो देखा , उसी का समाधान निकलना प्रारमभ कर दिया । वासिव में दलित विषयक समसया की जड़ में जाने का प्रयास मात् दिखावा था ।
आर्थिक एवं राजनीतिक पक्ष का यदि निदान हो जाये तो भी सामाजिक सवरुप पर इसका प्रभाव नाम मात् के लिए ही होता हैं । इसलिए
जब तक सामाजिक सवरूप में परिवर्तन नहीं आता , तब तक आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन का अर्थ अपूर्ण , अपर्यापि एवं अनावशयक है । इसलिए अब हम समझ सकते हैं कि आज तक दलितोतथान यानी जाति समसया के उनमूिन या समाधान की दिशा में किये गए हमारे प्रयास कयों अपूर्ण , अपर्यापि एवं अनावशयक था । समाज में वयापि दलित वर्ग के लिए सथातपि मानयिाओं पर आधारित मानसिक संक्पनाओं में परिवर्तन को जब तक बदला नहीं जाता तब तक जाति समसया के समाधान की दिशा में एक भारी शूनयिा ही माना जायेगा ।
जाति से जुडी समसया के समाधान के लिए समाज में परिवर्तन आवशयक हैं , लेकिन यह परिवर्तन " कया और कैसे हो ?" यह एक चिंतन का विषय है । इस समबनध में डलॉ अमबेडकर जैसे विद्ान के लिए किये गए कायषों के आलोक में कदम बढ़ाना श्ेयसकर एवं फलदायी प्रतीत होता है । इसके दो लाभ है प्रथम दलित समाज के साथ पूरे देश को भी डलॉ आंबेडकर पर भरोसा है । इसलिए इसकी सवीकारिता शंकारहित होगी । दूसरा यह है कि वर्तमान समय में जाति समसया के लिए डलॉ आंबेडकर से जयादा शोधपरक वयापक अधययन किसी वयसकि का न होने के कारण इसका पूरा लाभ भी इस प्रयास की
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