सत्ीवाद में प्राथमिकता बदल जाने से सत्ी- अधिकार के मुद्दों की भी प्राथमिकता में अनिर आ जाता हैं । उदाहरण के तौर पर गैर दलित सत्ीवाद में जाति धर्म दलित सत्ी अससमिा के बरकस केवल सत्ी- अससमिा पर ही फोकस हो जाता है । धर्म और जाति आधारित कुरीतियों , पेशों पर उतनी गंभीरता और समग्िा से बहस नहीं चली । मुद्दों की प्राथमिकता में एक और बात जो विशेष रूप से नोट करने लायक है , वह यह कि दलित सत्ीवाद में मुखय क्रम में पहले जाति आधारित सामाजिक हिंसा-यौन हिंसा और फिर यौन सविनत्िा है जबकि ग़ैरदलित सत्ीवाद में यौन सविनत्िा बनाम यौन हिंसा खासकर घरेलू हिंसा आदि क्रम है । सत्ी के सत्ी आधारित वर्ग बनने के यूटोपिया को पूरा महतव देने
के कारण भारत में दलित महिलाओं के साथ जाति आधारित हिंसा , यौन शोषण एक दलित महिला के एक नागरिक होने के अधिकार पर बात उतनी मुखरता से नहीं हो पाती , जितनी की जानी चाहिए ।
दलित सत्ीवाद की एक और खासियत है , भारत के संदभषों में सत्ी की ससथति पर काम कर रहे विचारकों को बिना लिंगीय भेदभाव और पूवा्षग्ह के बिना प्रेरणासत्ोि के रूप पहचान करते हुए योगदान को सवीकारना । दलित सत्ीवाद ने हमेशा अपने परिवेश से अपने प्रेरणासत्ोि चुने है । बुद्ध कालीन थेरियों से लेकर सावित्ी-जयोतिबा , पेरियार , डलॉ . अमबेडकर , ताराबाई शिंदे , फातिमा शेख , जाईबाई चौधरी , पंतड़िा रामाबाई , राजकुमारी अमृतकौर , दुर्गाबाई देशमुख । कहने का तातपय्ष
यह है कि जिसने भी जाति और लिंग आधारित असमानता के खिलाफ ईमानदारी से जंग छेड़ी , दलित सत्ीवाद के आधार सिमभ के रुप में उनको सवीकार कर लिया है ।
दलित सत्ीवाद की अहम विशेषता यह भी है कि उसके पास दलित ससत्यों का लिखा हुआ भरपूर रचनातमक साहितय है । यह साहितय दलित सत्ीवाद को समझने में मदद करता है । देश और राजय की सीमाओं के पार , दलित सत्ी द्ारा साहितय और आंदोलन के माधयम से उठाए गए सवाल दलित सत्ीवाद पर बात करने तथा सैद्धांतिकी गढ़ने में अतयंि सहायक हैं । सभी दलित सनि कवतयतत्यों , दलित लेखिकाओं ने अपनी कविता-कहानी-आतमकथा के माधयम से अपने दलित और सत्ी होने की पीड़ा को जिस मार्मिकता और प्रखरता से उकेरा है । वह अनय महिला साहितय में लगभग असंभव सा ही है ।
दलित सत्ीवाद के वैचारिक और सैंद्धांतिक पक्ष में भी सामाजिक के बाद आर्थिक सवालों का क्रम है , कयोंकि दलित सत्ी के उतपीडन का कारण उसका दलित होना के कारण ही है । सामाजिक और आर्थिक सवाल एक दूसरे से गुंथे हुए है । जबकि अनय सत्ीवाद में सामाजिक सवालों से पहले आर्थिक सवालो पर को महतव है । प्रमुखता पहले समाजिक फिर आर्थिक है । दलित सत्ीवाद की िड़ाई एक रेखीय है और वह रेखा है जहां भी शोषण दमन और अतयाचार हो , वहां बिना किसी पूवा्षग्ह के पीतड़ि और वंचित के हक में खडे होना । अधिकारों के इस संघर्ष में भटकाव- विचलन और द्ंद का कोई सथान नहीं है । दलित सत्ीवाद अपनी िड़ाई संवैधानिक तरीके से िड़ने में विशवास रखता है और अनि में दलित सत्ीवाद पुरूषों से अलग रहकर कोई नयी दुनिया बनाने के यूटोपिया में नहीं जीता । दलित सत्ीवाद एक ऐसे समाज की ओर अग्सर है , जहां ‘ सवातभमान ’, ‘ सममान ’ और ‘ बराबरी ’ के साथ सत्ी अधिकारों की सुरक्षा सुतनसशचि हो सके ।
( ्साभार )
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