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प्रतिबद्धता के साथ लिखने-रचने और सथातपि करने के लिए जी-जान से खडे हो गए हैं ।
दलित सत्ीवाद की कुछ ऐसी बातें हैं , जो उसे अनय सत्ीवाद से तब्कुि अलग करती है ; मसलन दलित सत्ीवाद में परिवार के ढांचे इतने क्रकूर तरीके से धवसि करने की बात नहीं की जाती जितनी कि सवर्ण सत्ीवाद में । इसका कारण भारत की जाति आधारित वयवसथा में दलित सत्ी व पुरूष दोनों प्रतातड़ि हैं , यह जरूर है कि दलित सत्ी जयादा प्रताडित है । परिवारिक ढांचे में दलित सत्ी घरेलू हिंसा जरूर झेलती हैं , परनिु दलित होने के कारण , उसके साथ सामाजिक हिंसा उससे कहीं जयादा होती है । परिवार का ढांचा , उसे सत्ी होने के कारण माककूि सुरक्षा नहीं देता कयोंकि दलित परिवारों में भी पितृसत्ता की िड़ें गहरी जमी हुई हैं , लेकिन इन सब के बावजूद परिवार के बाहर वह तब्कुि असुरक्षित है । अभी परिवार के अलावा सहजीवन आदि शैली में भी दलित सत्ी के जाति और लिंग के आधार पर जयादा शोषण होने के अवसर हैं ।
दलित चिंतक , जयोतिबा फुले एक ऐसे
दलित स्तीवाद और गैरदलित स्तीवाद में मुख्य अंतर और विरोध , मुद्ों की प्ाथमिकता को लेकर अंतर है । दलित स्तीवाद पहले जाति , फिर वर्ग की बात करता है , जबकि गैरदलित स्तीवाद पहले वर्ग फिर जाति । दोनों स्तीवाद में प्ाथमिकता बदल जाने से स्ती-अधिकार के मुद्ों की भी प्ाथमिकता में अन्तर आ जाता हैं ।
आदर्श परिवार की क्पना करते थे जहाँ सत्ी- पुरुष दोनों बराबरी और सममान पाएं और अपनी-अपनी पहचान से जी सकें । दलित सत्ीवाद के सामने आदर्श जीवन साथी के रूप में जयोतिबा फुले और सावित्ी बाई फुले है । जो तमाम जिंदगी अपने अपने कार्य करते हुए भी समाज से जुड़े रहे । यह मुद्दा अनय सत्ीवाद की तरह दलित सत्ीवाद के लिए प्राथमिक नही है । लेकिन दुख है कि पहले विभिन्न महिला आंदोलनों ; चाहे वह जिस भी विचारधारा के तहत चले हो , दलित सत्ीवाद को सूत्बद्ध करने की पूरी तरह अनदेखी करते रहे ।
दलित सत्ीवाद की दूसरी खासियत इसका मुद्दों के ' वैशवीकरण ' के साथ ' देशीकरण ' तथा ' सथानीयकरण ' है । कहने का मतलब देश- विदेश मे मानव अधिकारों व मानवीय सरोकारों
के लिए चल रहे आंदोलनों से दलित सत्ीवाद का जुडाव है । दलित सत्ीवाद किसी भी देश , जाति , धर्म , वर्ग समुदाय , रंग , लिंग आदि के आधार पर उतपीड़न-शोषण और अधिकार- हनन का विरोध करते हुए उनके साथ खड़ा होने में विशवास रखता है । दलित सत्ीवाद की पांचवी विशेषता देश-विदेश में मानव अधिकार के पक्ष में चल रहे आनदोिन को समर्थन देना है । सभी आनदोिनों में दलित ससत्यों की भागीदारी सबसे अधिक होती है , बेशक वे लीडरशिप में न हो ।
दलित सत्ीवाद और ग़ैरदलित सत्ीवाद में मुखय अंतर और विरोध , मुद्दों की प्राथमिकता को लेकर अंतर है । दलित सत्ीवाद पहले जाति , फिर वर्ग की बात करता है , जबकि ग़ैरदलित सत्ीवाद पहले वर्ग फिर जाति । दोनों
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