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शुभचिंतकों सेनापति टी . तप्िई तथा मुरुंडू बंधुओं ने उसे किसी सुरक्षित सथान पर चले जाने की सलाह दी ।
उस समय मैसूर पर हैदर अली का शासन था । अंग्ेि उसके नाम से भी घबराते थे । वेलु नाचियार ने हैदर अली को पत् लिखा । कुछ ही अवधि के बाद रानी को हैदर अली की ओर से बुलावा आ गया । मुलाकात के लिए डिंडीगुल किले को चुना गया । वेलु जब डिंडीगुल पहुंची तो हैदर अली ने उसका सवागत रानी की तरह किया । वेलु ने उसे सारे घटनाक्रम के बारे में बताया । कहा कि वह अंग्ेिों को खदेड़कर शिवगंगा की वापसी चाहती है । इससे खुश होकर हैदर अली ने वेलु को 400 पाउंड मासिक की आर्थिक सहायता , 5,000 पैदल सेना , इतने ही घुड़सवार सैनिक और भारी मात्ा में असत्-शसत् भी प्रदान किए । यही नहीं , रानी वेलु नाचियार के प्रति अपनी मैत्ी का भरोसा दिलाते हुए हैदर अली ने वहां एक मंदिर भी बनवा दिया ।
उदरायल िरारी – सेिरा करा गठन
हैदर अली का समर्थन प्रापि करने के बाद रानी वेलु नाचियार विरुपाक्षी लौट आई । वहां रहते हुए उसने सेना का गठन किया । अलग से ससत्यों की सेना बनाई , जिसे उसने उदायल नामक बहादुर सत्ी के नाम पर ‘ उदायल नारी सेना ’ नाम दिया । उन दिनों वेलु नाचियार शिवगंगा से निकलकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में भटक रही थी । तरिटिश सैनिक उसके पीछे लगे थे । उनसे बचते-बचाते वेलु ने अरियाकुरिची कोविल में शरण ली थी । इस बीच उसका पीछा करते हुए अंग्ेि सैनिक वहां पहुंच गए । उनहोंने उदायल से वेलु नाचियार का पता बताने को कहा । उदायल ने साफ मना कर दिया और अकेली ही अंग्ेिों पर टूट पड़ी । क्रुद्ध सैनिकों ने उदायल को वहीं मार दिया ।
उसी वीरांगना के नाम पर वेलु ने अपनी नारी सेना का नामकरण किया था । उसने साथ रह रही ससत्यों को समझाया कि वे पुरुषों से
किसी भी मायने में कम नहीं हैं । अवसर आने पर बड़े से बड़े खतरे का सामना कर सकती हैं । वेलु नाचियार महिला सैनिकों को खुद प्रशिक्षण देती थी । अपनी सबसे भरोसेमंद , बहादुर तथा तीक्ण मति कुयिली को उसने नारी सेना का सेनापति नियुकि किया था ।
कु यिली करा आत्म – बलिदराि और शिवगंररा पर जीत
वेलु नाचियार जोर-शोर से सैनय तैयारियों
भीतर जाने के बाद वेलु नाचियार को अंग्ेजों के शस्तागार का पता लगाने में देर न लगी । दुर्ग में नबाव और अंग्ेजों की बडी सेना मौजूद थी । अवसर देख कु यिली की स्ती सेना ने हमला बोल दिया । अंग्ेज उनसे जूझने लगे , कु यिली के मस्तिष्क में चल रही योजना के बारे में सिवाय उसके किसी को अंदाजा न था । मंदिर में दीपक जलाने के लिए घी का इंतजाम था ।
में जुटी थी । सत्ी और पुरुष सेनाएं प्राितःकाल प्रशिक्षण में जुट जातीं थीं । रानी खुद उसमें हिससा लेती थी । उसने ससत्यों को तलवारबाजी के अलावा ‘ हांसिया ’ से निशाना लगाने का प्रशिक्षण भी दिया था । 8 वरषों तक वेलु नाचियार युद्ध की तैयारी में लगी रही । आखिर वह अवसर आ ही गया , जिसकी उसे लंबे समय से प्रतीक्षा थी । शिवगंगा दुर्ग के भीतर देवी राजराजेशवरी का मंदिर था । उसमें प्रतिवर्ष दशहरे का उतसव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था । देवी-पूजन
के समय ससत्यां बड़ी संखया में शामिल होती थीं । वेलु नाचियार उसी अवसर का लाभ उठाने का निर्णय किया । उसे अपनी सेनाओं पर भरोसा पर था । उसके बलपर वह कई िड़ाइयां भी जीत चुकी थी । लेकिन अंग्ेिों के पास उस समय के आधुनिकतम हथियार थे । भारी- भरकम सेना थी । उससे पार पाना , असंभव नहीं तो आसान भी नहीं था ।
उस समय कुयिली के मससि्क में एक और योजना काम कर रही थी । जिसका अंदाजा सवयं रानी को भी नहीं था । वह जानती थी कि दशहरे के दिन राजय-भर की ससत्यां शिवगंगा के दुर्ग में राजराजेशवरी देवी की पूजा के लिए जाती हैं । उस दिन दुर्ग के दरवाजे खोल दिए जाते हैं । मंदिर के पास ही अंग्ेिों का शसत्ागार होने के कारण पुरुषों को उस उतसव में शामिल होने की अनुमति नहीं होती । दशहरे के दिन जैसे ही दुर्ग का मुखय द्ार खुला , कुयिली के साथ ‘ उदायल रानी सेना ’ की वीरांगनाएं भी दुर्ग में प्रवेश कर गईं । वे सब साधारण वसत्ों में थीं । रकूिों और फलों की टोकरियों में उनहोंने अपने हथियार छिपाए हुए थे । अंग्ेिों के सैनिकों को उसकी भनक तक न लगी ।
भीतर जाने के बाद वेलु नाचियार को अंग्ेिों के शसत्ागार का पता लगाने में देर न लगी । दुर्ग में नबाव और अंग्ेिों की बड़ी सेना मौजूद थी । अवसर देख कुयिली की सत्ी सेना ने हमला बोल दिया । अंग्ेि उनसे जूझने लगे , कुयिली के मससि्क में चल रही योजना के बारे में सिवाय उसके किसी को अंदाजा न था । मंदिर में दीपक जलाने के लिए घी का इंतजाम था । भीड़-भाड़ का फायदा उठाकर कुयिली ने अपने सैनिकों से घी को अपने ऊपर उंडेल देने को कहा । घी से तर-बतर होने के बाद , भीड़ का फायदा उठाकर वह शसत्ागार की ओर बढ़ गई । भीतर जाते ही उसने अपने कपड़ों में आग लगा ली । वहां तैनात रक्षक कुछ समझ पाएं उससे पहले ही शसत्ागार में आग भड़क उठी । देखते ही देखते पूरा शसत्ागार आग की लपटों से घिर गया ।
इसी के साथ वेलु नाचियार ने अपनी सेना
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