eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 33

ईस्ट इंद्ियरा कं पनी की नजर
1746 में 16 वर्ष की अवसथा में वेलु नाचियार के पिता ने उसका विवाह शिवगंगा के महाराज शशिवर्मा थेवर के बेटे मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर के साथ कर दिया । शशिवर्मा महतवाकांक्षी राजा थे । उनहोंने शिवगंगा के आसपास के जंगलों को साफ कराया था , ताकि वहां खेती की जा सके । इसके अलावा जगह- जगह तालाब , सड़कें और मंदिर बनवाकर उनहोंने शिवगंगा को संवारने-सजाने का काम किया था । शशिवर्मा के निधन के उपरांत मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर को शिवगंगा का अधिपति बनाया गया । उस समय वेलु नाचियार अपने पति की तमत् , सलाहकार और भरोसेमंद सहयोगी सिद्ध हुईं । कुछ समय बाद दोनों के एक पुत्ी का जनम हुआ । उसका नाम उनहोंने वेलाची नाचियार रखा ।

ईस्ट इंद्ियरा कं पनी की नजर

वह समय था जब ईसट इंडिया कंपनी दक्षिण
में अपने पांव पसारने में लगी थी । आरकोट का नबाव उसके आगे समर्पण कर चुका था । कंपनी की नजर शिवगंगा पर थी । बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के चलते रामनाथपुरम और शिवगंगा के शासकों ने नबाव को टैकस का भुगतान करने से इनकार कर दिया । इससे आरकोट के नबाव ने ईसट इंडिया कंपनी से शिकायत कर दी । अंग्ेि पहले से ही उपयुकि अवसर की तलाश में थे । नबाव के सहयोग ने उनका काम आसान कर दिया था । शिवगंगा जिले के कालियार कोविल नामक कसबे में महाकालेशवर का अति प्राचीन मंदिर था । मुत्तुवेदुंगानाथ थेवर के शासनकाल में उसकी यशकीर्ति चारों-दिशाओं में फैली हुई थी । जून 1772 में मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर अपनी दूसरी पत्नी गोरी नाचियार के साथ महाकालेशवर के दर्शन के लिए गए हुए थे । इस बीच कर उगाही के बहाने आरकोट के नबाव तथा कंपनी की फौजों ने शिवगंगा पर हमला कर दिया ।
नबाव और अंग्ेिों के बीच पक रही खिचड़ी की ओर से वेदुंगानाथ सावधान थे । हमले की आशंका को देखते हुए रानी वेलु नाचियार के साथ वे सुरक्षा प्रबंधों में लगे थे । शिवगंगा के चारों और कंटीली झातड़यों से भरे हुए मैदान थे । हमलों से बचाव के लिए थेवर ने शिवगंगा की ओर आने वाले रासिों को खुदवाकर जगह- जगह खाइयां बनवा दीं । उपयुकि सथानों पर सैनिक चौकियां बनाकर सुरक्षा के इंतजाम किए गए । आखिर वह समय भी आ पहुंचा जिसकी आशंका थी । 21 जून को कर्नल जोसेफ ससमथ पूरब तथा कैपटन बिंजोर पसशचम से आगे बढ़ा । अंग्ेिों तथा नबाव की संयुकि फौज के आगे शिवगंगा की सुरक्षा के सभी इंतजाम नाकाफी सिद्ध हुए । देखते ही देखते कीरानूर और शोलापुरम चौकियों पर अंग्ेिों का कबिा हो गया । 25 जून 1772 को मुत्तुवेदुगानाथ थेवर की फौजों तथा अंग्ेिों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ । अपने सेनानायकों के साथ राजा ने दुशमनों का जमकर सामना किया । मगर दो- तरफा हमले में घिरकर उनहें तथा गोरी नाचियार को अपनी जान गंवानी पड़ी । उनके गिरते ही अंग्ेि फौज ने भीषण मारकाट मचा दी । मंदिर और बसिी को लूट लिया गया । सैकड़ों सत्ी- पुरुष और बच्े मौत के घाट उतार दिए गए ।
बचाव की कोई संभावना न देख वेलु नाचियार ने अपनी बेटी के साथ शिवगंगा दुर्ग छोड़ दिया । उसके जाते ही दुर्ग पर आरकोट के नबाव ने कबिा कर लिया । शिवगंगा का नाम बदलकर हुसैन नगर कर दिया गया । उस बदलाव को कंपनी की मंजूरी भी मिल गई । उधर तरिटिश और नबाव की सेना से बचती- बचाती , अपने गिने-चुने अंगरक्षकों साथ रानी डिंडीगुल के निकट विरुपाक्षी पहुंची । वहां का राजा गोपाल नायककर रानी का हितैषी था । उसने रानी को संरक्षण दिया । कुछ समय बाद रानी के भरोसेमंद सेनानायक पेरिया मुरुंडू तथा चिन्ना मुरुंडू भी वहां पहुंच गए । क्षुबध रानी अंग्ेिों से बदला लेने की सोच रही थी । दूसरी ओर अंग्ेिी फौजें उसे खोजती हुई आगे बढ़ रही थीं । बढ़िे हुए खतरे को देख रानी के
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