1746 में 16 वर्ष की अवसथा में वेलु नाचियार के पिता ने उसका विवाह शिवगंगा के महाराज शशिवर्मा थेवर के बेटे मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर के साथ कर दिया । शशिवर्मा महतवाकांक्षी राजा थे । उनहोंने शिवगंगा के आसपास के जंगलों को साफ कराया था , ताकि वहां खेती की जा सके । इसके अलावा जगह- जगह तालाब , सड़कें और मंदिर बनवाकर उनहोंने शिवगंगा को संवारने-सजाने का काम किया था । शशिवर्मा के निधन के उपरांत मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर को शिवगंगा का अधिपति बनाया गया । उस समय वेलु नाचियार अपने पति की तमत् , सलाहकार और भरोसेमंद सहयोगी सिद्ध हुईं । कुछ समय बाद दोनों के एक पुत्ी का जनम हुआ । उसका नाम उनहोंने वेलाची नाचियार रखा ।
ईस्ट इंद्ियरा कं पनी की नजर
वह समय था जब ईसट इंडिया कंपनी दक्षिण
में अपने पांव पसारने में लगी थी । आरकोट का नबाव उसके आगे समर्पण कर चुका था । कंपनी की नजर शिवगंगा पर थी । बदलते राजनीतिक घटनाक्रम के चलते रामनाथपुरम और शिवगंगा के शासकों ने नबाव को टैकस का भुगतान करने से इनकार कर दिया । इससे आरकोट के नबाव ने ईसट इंडिया कंपनी से शिकायत कर दी । अंग्ेि पहले से ही उपयुकि अवसर की तलाश में थे । नबाव के सहयोग ने उनका काम आसान कर दिया था । शिवगंगा जिले के कालियार कोविल नामक कसबे में महाकालेशवर का अति प्राचीन मंदिर था । मुत्तुवेदुंगानाथ थेवर के शासनकाल में उसकी यशकीर्ति चारों-दिशाओं में फैली हुई थी । जून 1772 में मुत्तु वेदुंगानाथ थेवर अपनी दूसरी पत्नी गोरी नाचियार के साथ महाकालेशवर के दर्शन के लिए गए हुए थे । इस बीच कर उगाही के बहाने आरकोट के नबाव तथा कंपनी की फौजों ने शिवगंगा पर हमला कर दिया ।
नबाव और अंग्ेिों के बीच पक रही खिचड़ी की ओर से वेदुंगानाथ सावधान थे । हमले की आशंका को देखते हुए रानी वेलु नाचियार के साथ वे सुरक्षा प्रबंधों में लगे थे । शिवगंगा के चारों और कंटीली झातड़यों से भरे हुए मैदान थे । हमलों से बचाव के लिए थेवर ने शिवगंगा की ओर आने वाले रासिों को खुदवाकर जगह- जगह खाइयां बनवा दीं । उपयुकि सथानों पर सैनिक चौकियां बनाकर सुरक्षा के इंतजाम किए गए । आखिर वह समय भी आ पहुंचा जिसकी आशंका थी । 21 जून को कर्नल जोसेफ ससमथ पूरब तथा कैपटन बिंजोर पसशचम से आगे बढ़ा । अंग्ेिों तथा नबाव की संयुकि फौज के आगे शिवगंगा की सुरक्षा के सभी इंतजाम नाकाफी सिद्ध हुए । देखते ही देखते कीरानूर और शोलापुरम चौकियों पर अंग्ेिों का कबिा हो गया । 25 जून 1772 को मुत्तुवेदुगानाथ थेवर की फौजों तथा अंग्ेिों के बीच निर्णायक युद्ध हुआ । अपने सेनानायकों के साथ राजा ने दुशमनों का जमकर सामना किया । मगर दो- तरफा हमले में घिरकर उनहें तथा गोरी नाचियार को अपनी जान गंवानी पड़ी । उनके गिरते ही अंग्ेि फौज ने भीषण मारकाट मचा दी । मंदिर और बसिी को लूट लिया गया । सैकड़ों सत्ी- पुरुष और बच्े मौत के घाट उतार दिए गए ।
बचाव की कोई संभावना न देख वेलु नाचियार ने अपनी बेटी के साथ शिवगंगा दुर्ग छोड़ दिया । उसके जाते ही दुर्ग पर आरकोट के नबाव ने कबिा कर लिया । शिवगंगा का नाम बदलकर हुसैन नगर कर दिया गया । उस बदलाव को कंपनी की मंजूरी भी मिल गई । उधर तरिटिश और नबाव की सेना से बचती- बचाती , अपने गिने-चुने अंगरक्षकों साथ रानी डिंडीगुल के निकट विरुपाक्षी पहुंची । वहां का राजा गोपाल नायककर रानी का हितैषी था । उसने रानी को संरक्षण दिया । कुछ समय बाद रानी के भरोसेमंद सेनानायक पेरिया मुरुंडू तथा चिन्ना मुरुंडू भी वहां पहुंच गए । क्षुबध रानी अंग्ेिों से बदला लेने की सोच रही थी । दूसरी ओर अंग्ेिी फौजें उसे खोजती हुई आगे बढ़ रही थीं । बढ़िे हुए खतरे को देख रानी के
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