के साथ शिवगंगा किले पर धावा बोल दिया । अंग्ेि उसका युद्ध कौशल देखकर हैरान थे । कुछ ही देर में वे मैदान छोड़कर भागने लगे । किले पर वेलु नाचियार का कबिा हो गया । कुयिली सहित उन सभी महिलाओं , जिनहोंने उस युद्ध में बलिदान दिया था , को वेलु नाचियार ने अपनी धर्म-पुत्ी का दर्जा दिया । युद्ध में अद्िीय वीरता का प्रदर्शन करने वाले मुरुंडू बंधुओं , पेरिया मुरुंडू तथा चिन्ना मुरुंडू को मंत्ी बनाया गया । उसके बाद रानी करीब 10 वरषों तक शिवगंगा पर शासन किया ।
प्थम मद्हलरा बम कु यिली
शिवगंगा की िड़ाई में आतमबलिदान करने वाली कुयिली को भारत की प्रथम ‘ महिला बम ’ होने का गौरव प्रापि है । तमिल नाडु में लोग उसे ‘ वीरामंगाई ’( बहादुर सत्ी ) और ‘ वीरदलपति ’( बहादुर सेनानायक ) कहकर बुलाते हैं । उसका जनम ‘ अरुणथतथयार ’ नामक दलित जाति में हुआ था । तमिलनाडु में इस
जाति के लोग आमतौर पर मेहनत-मजदूरी और चमड़े का काम करते हैं । कुयिली के पिता का नाम पेरियामुथन और मां का नाम राककू था । दोनों ही खेतिहर मजदूर थे । कुयिली की मां राककू साहसी और बहादुर महिला के रूप में विखयाि थीं । एक बार एक जंगली सांड ने उसके खेत पर हमला कर दिया था । साहसी राककू अकेले ही उससे तभड़ गई । उसी संघर्ष में उसने अपनी जान दे दी । पत्नी की मृतयु से विक्षुबध पेरियामुथुन , कुयिली को लेकर शिवगंगा चला गया । वहां वह मोची का काम करके अपना जीवनयापन करने लगा ।
पेरियामुथुन ने कुयिली को उसकी मां की बहादुरी के किससे सुनाते हुए बड़ा किया था । वह खुद भी बहादुर था । जिन दिनों वेलु नाचियार सैनय-संगठन के काम में लगी थी — पेरियामुथुन भी उसकी सेना में शामिल हो गया । वेलु नाचियार ने उसे गुपिचर का काम सौंप दिया । इसी बीच कुयिली और वेलु
नाचियार का परिचय हुआ , जो निरंतर घतन्टिा में बदलता गया । पेरियामुथुन और कुयिली रानी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में थे । वे आवशयकतानुसार कभी भी , बेरोकटोक रानी के पास आ-जा सकते थे ।
कुयिली रानी की निजी सुरक्षा का काम देखती थी । उसने अनेक अवसरों पर रानी के प्राणों की रक्षा की थी । एक रात वेलु नाचियार सोई हुई थी । तभी एक धोखेबाज ने उस पर जान लेवा हमला कर दिया । कुयिली उससे तभड़ गई । उनकी आवाजें सुन हमलावर भाग गया । आवाज सुनकर वेलु नाचियार बाहर आई तो उसने कुयिली को घायल अवसथा में देखा । रानी ने ितक्षण अपनी साड़ी का प्िू फाड़कर कुयिली के घावों पर बांध दिया । कुयिली की वीरता , तीक्ण मति की इसके अलावा और भी कई कहानियां हैं । कुयिली की वीरता और बलिदान की झलक 77 वर्ष बाद झलकारी बाई में भी दिखाई पड़िी है ।
( ्साभार )
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