eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Seite 28

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नवीन कुमार
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छद्म इप्तहास में गुम हो गए दलित स्वतंत्रता सेनानी

ब देश की सविंत्िा की बात

त्ड़िी है तो दलित उसमें कहीं
नहीं दिखते , इतिहास से एक वर्ग के योगदान को पूरी तरह मिटा दिया गया । और जो लोग अंग्ेिों के तलवे चाटते रहे और राय साहब की उपाधियों से सुसतजित होते रहे उनहें देशभकिों की श्ेणी में ला दिया गया । जबकी उनके ऊपर ना जाने कितने क्रांतिकारियों के खून का कर्ज चढ़ा है । दलित वर्ग के कई क्रांतिकारियों को दोहरी मानसिकता रखने इतिहास लेखकों ने किनारे रखा , जिसके चलते उनहें वह जगह नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी । इनमें सबसे पहले बात करते हैं उदैया चमार की जो छतारी के नवाब के वफादार और प्रिय योद्धा थे , जिनहोंने 1804
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में अंग्ेिों की गलत नीतियों से खफा होकर सैकड़ों अंग्ेिों को मौत के घाट उतार दिया था । उनकी वीरता के चचवे आज भी अलीगढ़ के आस -पास के क्षेत्ो में कहे सुने जा सकते हैं । आखिर 1807 में पकड़ कर फांसी दे दी गयी , लेकिन निडर ऊदैया ने अकेले ही अंग्ेिों से लोहा लिया था । जौनपुर जिले कुवरपुर गांव के बांके चमार भी अकेले ही अंग्ेिों से लोहा लेने निकल पड़े थे लेकिन उनकी बहादुरी देखकर बहुत सारे लोग उनसे प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़ गए और अंग्ेिों से जंग का ऐलान कर दिया । लगातार अंग्ेिों के खिलाफ गतिविधियों के कारण उन पर 50 हजार रुपये का का इनाम रखा गया था । 50 हज़ार रुपए उस ज़माने में काफी बड़ी रकम होती थी । अब आप इस रकम से ही अंदाजा
उदैया चमार