अपनी ' भारी गलती ' के लिए क्षमायाचना की और तुरंत ही कालीकट के हिंदुओं की तरफ से दस हज़ार रु की रकम मुससिमों के हवाले की । मौलवी अ्िाहबखश ने कहा कि महाननदी सच्े हिनदू हैं और आला दिवे के महापुरुष हैं । कुछ दिनों बाद ही महानदी अययर सहित हज़ारों हिंदुओं को बेरहमी से काट दिया गया , हज़ारों हिनदू महिलाओं की बलातकार के बाद हतया हुई , हज़ारों का धर्मपरिवर्तन हुआ ।
देश मे खिलाफत आंदोलन की वजह से ' हिनदू-मुसलमान एकता ' कायम हुई-देश के वामपंथी इतिहासकारों ने भ्रम फैलाकर देश और समाज का बड़ा नुकसान किया है । मोपला दंगों में जान गंवाने वाले और फिर धर्म परिवर्तन के
मजबूर किये गए लोगों में एक बड़ा वर्ग दलित समाज का था । भारतीय इतिहास में खिलाफत आनदोिन का वर्णन तो है , किनिु कहीं भी विसिार से नहीं बताया गया कि खिलाफत आनदोिन वसिुि : भारत की सवाधीनता के लिए नहीं , अपितु वह एक रा्ट्र विरोधी व हिनदू विरोधी आनदोिन था । खिलाफत आनदोिन दूर ससथि देश तुकवी के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्ारा चलाया गया आनदोिन था । तुकवी की " इसिातमक " जनता ने बर्बर व रूढिवादी इसिामी कानूनों से तंग आ कर
एकजुटता से मुसिरा कमाल पाशा के नेतृतव में तुकवी के खलीफा को देश निकला दे दिया था । भारत में मोहममद अली जौहर व शौकत अली जौहर दो भाई खिलाफत आंदोलन का नेतृतव कर रहे थे । गांधी चाहते थे कि मुसलमान भारत की ' आजादी के आंदोलन ' से किसी भी तरह जुड़ जाएं । अत : उनहोंने 1921 में अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी से जुड कर ‘ खिलाफत आंदोलन ' की घोषणा कर दी , यद्तप इस आंदोलन की पहली मांग खलीफा पद की पुनसथा्षपना थी ।
मुसलमान सुन्नी इसिामी उममि और खलीफा , खिलाफत के आगे नहीं सोचते थे । इस खिलाफत आंदोलन के दौरान ही मोहममद
अली जौहर ने अफगानिसिान के शाह अमानु्िा को तार भेजकर भारत को दारुल इसिाम बनाने के लिए अपनी सेनाएं भेजने का अनुरोध किया । इसी बीच तुकवी के खलीफा सु्िान अबदुि माजिद सपरिवार ( 13 पत्नियों के साथ ) मा्टा चले गये । आधुनिक विचारों के समर्थक मुसिरा कमाल पाशा नये शासक बने । भारत आकर मोहममद अली जौहर ने भारत को दारुल हरब ( संघर्ष की भूमि , जहां काफिर का शासन है ) कहकर मौलाना अबदुि बारी से हिजरत का फतवा जारी करवाया । इस
पर हजारों मुसलमान अपनी समपतत्त बेचकर अफगानिसिान चल दिये । इनमें उत्तर भारतीयों की संखया सर्वाधिक थी । पर वहां उनके ही तथाकथित मजहबी भाइयों / इसिामी उममा ने ही उनहें खूब मारा तथा उनकी समपतत्त भी लूट ली । वापस लौटते हुए उनहोंने देश भर में दंगे और लूटपाट की । सिर्फ केरल में बीएस हजार से अधिक हिनदू ( अधिकांश दलित एवं पिछड़े ) धमािंिरित किये गये । इसे ‘ मोपला कांड भी कहा जाता है ।
उन दिनों कांग्ेस के अधिवेशन वंदेमातरम के गायन से प्रारमभ होते थे , 1923 का अधिवेशन आंध्र प्रदेश में काकीनाड़ा नामक सथान पर था । मोहममद अली जौहर उस समय कांग्ेस के अधयक्ष थे जब प्रखयाि गायक तव्णु दिगमबर पलुसकर ने वनदेमातरम गीत प्रारमभ किया , तो मोहममद अली जौहर ने इसे इसिाम विरोधी बताकर रोकना चाहा । इस पर श्ी पलुसकर ने कहा कि यह कांग्ेस का मंच है , कोई मससिद नहीं और उनहोंने पूरे मनोयोग से वनदे मातरम गाया । इस पर जौहर विरोधसवरूप मंच से उतर गया था ।
मोहनदास करमचंद गांधी ने बिना विचार किये ही इस आनदोिन को अपना समर्थन दे दिया , जबकि इससे हमारे देश का कुछ भी लेना-देना नहीं था । जब यह आनदोिन असफल हो गया , जो कि होना ही था , तो केरल के मुससिम बहुल मोपला क्षेत् में अ्पसंखयक हिनदुओं पर अमानुषिक अतयाचार किये गए , माता-बहनों का शील भंग किया गया और हतयाएं की गयीं । खेद का विषय यह भी है कि गांधी ने इन दंगों की कभी आलोचना नहीं की और दंगाइयों की गुंडागदवी को यह कहकर उचित ठहराया कि वे तो अपने धर्म का पालन कर रहे थे । सिर्फ मोपला ही नहीं अपितु पूरे ततकािीन तरिटिश भारत में अमानवीय मुससिम दंगे , लूटपाट और हिंदू हतयाऐं हुई थी , पर गांधी ने उन पर कभी किसी हिंदू हेतु संज्ान नहीं लिया । मुसलमानों के प्रति गांधी के पक्षपात का यह अकेला उदाहरण नहीं है , ऐसे उदाहरण हम पहले भी देख चुके हैं । �
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