eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 24

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मुकि शिक्षा वयवसथा लागू हुई । इससे कुछ लोगों को लाभ मिला था । आज़ादी के बाद इस बात को सवीकार किया गया और इस दिशा में नीति बनाने की ज़रूरत भी महसूस की गई । दो तरह की शिक्षा नीति बनाई गई । एक तो इस बात पर आधारित थी कि इतिहास में जो वर्ग शिक्षा से वंचित रहे हैं उनहें आरक्षण के माधयम से मुखयधारा में आने का अवसर दिया जाए । इसे उनकी जनसंखया के आधार पर तय किया गया । दूसरी तरह की नीति के तहत ग़रीब और पीछे छूटे हुए लोगों के लिए छात्वृत्ति , किताबें और अनय रूपों में आर्थिक मदद जैसी वयवसथा की गईI ”
भारतीय संविधान के अनुच्ेद-46 के अनुसार- ' राजय विशेष सावधानी के साथ समाज के कमजोर वगषों , विशेषकर अनुसूचित जाति / जनजातियों के शैक्षिक एवं आर्थिक हितों के उन्नयन को बढ़ावा देगा और सामाजिक अनयाय और सभी प्रकार के सामाजिक शोषण से उनकी रक्षा करेगा '। अनुच्ेद 330 , 332 , 335 , 338 से 342 तथा संविधान के 5वीं और 6ठी अनुसूची
अनुच्ेद 46 में दिए गए लक्य हेतु विशेष प्रावधानों के संबंध में कार्य करते हैं । मेरा यह मानना है कि दलित एवं पिछड़े वगषों के लिए शिक्षा , आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन का एक महतवपूर्ण कारक है । शिक्षा ही एक ऐसा मूलमंत् है जिससे हम अपने अतीत के साथ-साथ वर्तमान सामाजिक ससथति का सहज आंकलन कर सकते हैं ।
कोठारी आयोग भारत का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था , जिसने अपनी रिपार्ट में सामाजिक बदलावों के मद्देनज़र कुछ ठोस सुझाव दिए । आयोग ने शिक्षा पर सरकारी वयय बढ़ाने की बात की थी लेकिन 50 साल गुजर जाने के बावजूद आज भी सकल घरेलु उतपाद का छह प्रतिशत भी शिक्षा के ऊपर खर्च नहीं किया जाता । समावेशी विकास के तहत इसे 9 % प्रतिशत ( नाइन इज माइन ) करने की बात थी लेकिन अब वो पुरानी बात हो गई है ।
रा्ट्रीय शिक्षा नीति 24 जुलाई 1986 को भारत की प्रथम रा्ट्रीय शिक्षा नीति घोषित की गई । सामाजिक दक्षता , रा्ट्रीय एकता एवं समाजवादी समाज की सथापना करने का
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