लक्य निर्धारित किया गया । रा्ट्रीय शिक्षा का मूल मंत् यह है कि एक तनसशचि सिर तक प्रतयेक बच्े को बिना किसी जात-पात , धर्म , सथान , लिंग भेद के , लगभग एक जैसी शिक्षा प्रदान की जाये । इस दृष्ट से अगर हम नवोदय विद्ािय , औपचारिक विद्ािय और अनौपचारिक विद्ािय में प्रति छात् प्रति वर्ष आने वाले खर्च को देंखें तो साफ़ साफ़ पता चलता है कि शिक्षा की तीनों अलग-अलग परतें शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्ट से कितनी असमान हो सकती हैं । धयान देने की बात यह है कि नवोदय विद्ािय में प्रति वर्ष प्रति छात् खर्च ( 1990 के मू्य पर आधारित ) 10,000 से ऊपर , सरकारी प्राथमिक विद्ाियों में 700 के आस-पास तथा अनौपचारिक केनद्रों में 100 के आस-पास है । यह सोचने वाली बात है कि शिक्षा में लागत के सिर पर इतना बड़ा अंतर भला किस तरह
शिक्षा की एकसमान गुणवत्ता बरक़रार रखेगा । प्रतिभाशाली छात्ों के लिए नवोदय किसम के विद्ािय की सथापना वस्तुतः अपनी अवधारणा में ही यह मानकर चलती है कि कुछ बच्े जनमिात ही प्रतिभाशाली होते हैं और बाकि के बच्े जनम से ही फिसड्ी । इनमें सामाजिक-सांसकृतिक और आर्थिक कारकों का योगदान नहीं होता । साथ ही यह अच्ी शिक्षा का हक़ सिर्फ तथाकथित जनम से ही प्रतिभाशाली माने जाने वाले छात्ों का ही है , बाकी का नहीं ।
पियरे बोर्दिऊ ने अपनी पुसिक ‘ सांसकृतिक उतपादन ’ में इसी ससथति को दर्शाया है , वे कहते हैं कि अभिजन वर्ग के बच्े अपने पूर्वजों की सांसकृतिक पूंजी की वजह से पहले ही मजबूत ससथति में रहते हैं जिसमें उन बच्ों का अपना कोई योगदान नहीं रहता । जबकि राममूर्ति समिति ( 1990 ) सवयं ही यह मानती
है कि इसमें समानता और सामाजिक नयाय का प्रश्न जुड़ा है , कयोंकि अधिकतर ग्ामीण बच्े गरीबी के कारण निम्न सिर के स्कूलों में ही शिक्षा पाते हैं जिससे उनकी प्रतिभा , रुझान और योगयिा का विकास सीमित हो जाता है । पाउलो फ्ेरे जैसे प्रतिष्ठि शिक्षाविद ने अपने साक्षातकार में कहा था कि- उनके परिवार के पास प्रायतः खाने के लिए पर्यापि भोजन नहीं रहता था , इस वजह से वह स्कूल में पिछड़ गए । इन शिक्षाविदों की बातों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि राजनीतिक दलों का इससे कुछ लेना-देना नहीं है । यही वजह है कि सैद्धांतिक तौर पर तो वे सामाजिक नयाय की बात करते हैं परनिु इसे जमीनी रूप देने वाले कार्यक्रमों में इसकी झलक नहीं मिल पाती ।
भारतीय जाति वयवसथा में वयापि संकीर्णता और असमानता हमें एक दूसरे से वयावहारिक और वैचारिक तौर पर अलग करते हैं । लेकिन अगर इस समाज में वयापि कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने की बात हो तो इसमें भी वैचारिक मतभेद हो सकता हैं | समसया तो यह है कि आज के शिक्षितों में से कई लोगों को समाज और देश की समसयाओं की समझ ही नहीं है । हम देखते हैं कि आज भी समाज के शिक्षित वर्ग में समाज और देश की समसयाओं को समझने की सकारातमक और वैज्ातनक दृष्टकोण का अभाव है । शिक्षा के समान अवसर , आर्थिक सुरक्षा , मू्य आधारित शिक्षा , सामाजिक , सांप्रदायिक और लिंग विभेद जैसी समसयाओं से अवगत कराने वाली शिक्षा-प्रणाली को लागू करने से देश में न केवल शिक्षा के सिर में सुधार आएगा बल्क साक्षरता का दर भी बढ़ेगा । जब पूरे देश में एकसमान ‘ कर ’ प्रणाली लागू की जा सकती है तो एक सामान शिक्षा वयवसथा कयों नहीं ? प्रयोग में सैद्धांतिक व वयवहारिक सिर पर कार्य करना होगा , देश-काल , समय की आवशयकता के अनुसार दोनों बातों पर एक साथ विचार करना ही समय और समाज की जरुरत है । �
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