पहले जाति से समबंतधि धार्मिक धारणाओं को समापि करना होगा जो शासत्ों में वर्णित है । सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा देने वाले कारकों में वे शिक्षा को प्रथम सथान देते हैं । वे कहते हैं ‘ शिक्षित बनो , संघर्ष करो और संगठित रहो ’। उनके इन सभी प्रयासों के फलसवरूप समाज में एक चेतना जाग्ि हुई तथा उनके बाद सभी राजनितिक दलों और सरकारों ने दलितों एवं पिछड़ों की शिक्षा के लिए सतत प्रयास किया ।
बाबा साहब भीमराव आंबेडकर का मानना था कि यदि समाज को एक वृक्ष मान लिया जाये तो अर्थनीति उसकी जड़ है , राजनीति
आधार , विज्ान आदि उसके रकूि हैं । इसलिए नये समाज की अर्थनीति या राजनीति पर दृष्टपात करने से पूर्व उसकी संसकृति की ओर सबसे अधिक धयान देना होगा , कयोंकि मूल और तने की सार्थकता तो उसके रकूि में है । इसी श्ृंखला में उनहोंने ‘ बतह्कृि हितकारी ’ सभा का गठन कर तेरह शिक्षण संसथाओं की सथापना की । उनहोंने समाज की नींव , नारी को , पुरुष के समान सशकि बनाने का बीड़ा भी उठाया । इसी क्रम में थोड़ा और अतीत में जायें तो हमारे बीच एक ऐसे युगपुरुष जयोतिबा फुले का नाम आता है जो सामाजिक क्रांति के अग्दूत के रूप में जाने जाते हैं । ऐसे समय
में जब भारतीय समाज अनेकों सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों के मकड़जाल में फंसा था और ससत्यों के लिए शिक्षा सर्वथा वर्जित थी , ऐसे में जयोतिबा फुले ने समाज को इन कुरीतियों से मुकि करने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाया । उनहोंने ‘ सतय शोधक समाज ’ नामक संगठन की सथापना कर देश में जगह-जगह शिक्षा की अलख जगाकर भारतीय जनमानस को शिक्षा के महतव से परिचय कराया ।
उनहोंने महारा्ट्र में सर्वप्रथम महिला शिक्षा तथा अछूतोद्धार का काम आरंभ किया तथा पुणे में िड़तकयों के लिए भारत का पहला विद्ािय खोला । जयोतिबा फुले क्रांतिकारी समाज सुधारक थे । उनहोंने धार्मिक पाखंड , सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविशवास का पुरजोर विरोध किया । भेदभाव रहित , समानतावादी , सतयशोधक समाज की सथापना करने वाले तथा नारी शिक्षा को प्रोतसातहि करने वाले जयोतिबा रकूिे का भारतीय समाज सदैव ऋणी रहेगा । बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर महातमा जयोतिबा फुले के आदशषों से बहुत प्रभावित थे और उनहोंने जयोतिबा फुले को अपना गुरु माना था ।
वर्तमान समय में अगर दलित समाज के बीच शिक्षा वयवसथा पर अधययन करें तो पाते हैं कि आजादी के 70 साल के बाद कुछ सुधार के बावजूद भी बृहत् सिर पर ससथति दयनीय बनी हुई है । भारतीय जनगणना 2011 के अनुसार भारत की जनसंखयास में लगभग 16.6 प्रतिशत या 20.14 करोड़ आबादी दलितों की है । अगर इनकी शैक्षणिक सिर की बात करें तो 35 % दलित आज भी निरक्षरता की ससथति में जीवन जीने को अभिशपि हैं ।
विशवतवद्ािय अनुदान आयोग के पूर्व अधयक्ष प्रोफ़ेसर सुखदेव थोराट लिखते हैं कि- “ आज़ादी से पहले की सामाजिक ससथति ऐसी थी कि दलित समाज के लोगों को शिक्षा का अधिकार नहीं था । इसके बाद अंग्ेज़ों के शासनकाल में ससथतियाँ कुछ बदलीं और एक
Qjojh 2021 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf 23