eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 22

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दलित वर्ग को लशलषित करने की चुनौती

घनश्ाम कुशवाहा

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तयेक देश या समाज की अभिवयसकि या पहचान उस देश और समाज में रहने वाली जनसंखया की शिक्षा वयवसथा पर निर्भर करता है । शिक्षा से हमारा तातपय्ष जिसके द्ारा हमें अपने बारे में , अपने समाज तथा अपने आस-पास की समसि चीजों के बारे में जानकारी प्रापि होती है ; तथा जिसके द्ारा हमें अपनी वैज्ातनक दृष्टकोण बढ़ाने और वसिुतन्ठिा का बोध होता है । शिक्षा को परिभाषित करते हुए प्रखयाि समाजशासत्ी इमाइल दुखवीम लिखते हैं , “ शिक्षा अधिक
आयु के लोगों द्ारा ऐसे लोगों के प्रति की जाने वाली क्रिया है जो अभी सामाजिक जीवन में प्रवेश करने के योगय नहीं है । इसका उद्देशय शिशु में उन भौतिक , बौद्धिक और नैतिक विशेषताओं का विकास करना है जो उसके लिए समपूण्ष समाज और पर्यावरण से अनुककूिन करने के लिए आवशयक है ।“ इस प्रकार दुखवीम शिक्षा को मानव के भौतिक , बौसधदक एवं नैतिक विकास तथा पर्यावरण से अनुककूिन का एक साधन मानते हैं ।
हम जानते हैं भारतीय समाज विविधताओं से भरा समाज है जिसमें लगभग प्रतयेक धर्म
व संप्रदाय के लोगों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के वर्ग व जातियां पायी जाती हैं । शिक्षा का प्रथम उद्देशय सभी को समान रूप से बिना भेदभाव किये शिक्षा प्रदान करना है । लेकिन भारतीय जाति वयवसथा की संरचना ‘ शुद्धता- अशुद्धता ’ तथा ‘ विनयातसि असमानता ’ पर आधारित होने तथा शुद्रों की सामाजिक पदक्रम में निम्न ससथति के कारण उनहें शिक्षा जैसी वयवसथा से दूर रखा गया था । जाति वयवसथा के दंश को झेलने वाले भीमराव आंबेडकर ने अपनी पुसिक ‘ एन्नीहिलेशन ऑफ़ कासट ’ में जाति वयवसथा की समासपि की बात की है । उनका मत था कि जाति को समापि करने से
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