eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 19

ही धमािंिरित होकर मुससिम धर्म कबूल करने वाली जनता से कराना प्रारमभ कर दिया । यह वह समय था , जब " हलाल " और " हराम " के आधार पर भारत में हिनदू-मुससिम के मधय विभेद की खाई चौड़ी होना प्रारमभ हुई । मांस के लिए पशु वध के लिए हलाल की मजहबी परमपरा मधयकाल से ही खटिक वर्ग के लिए नयी मुसीबत के रूप में सामने आयी । मांसाहार में अधिक रूचि रखने वाले विदेशी
और धमािंिरित मुससिमों के लिए हलाल मांस विहित किए जाने से झटका मांस के वयापार समापि होने लगा और खटिक वर्ग के लोगों के सामने भूखों मरने की ससथति पैदा हो गयी । इसके पीछे कारण यह है कि जिस प्रकार मुससिम के लिए झटका मांस खाना हराम है , ठीक उसी प्रकार हलाल मांस से हिनदू घृणा करता है । हिनदू खटिक वर्ग को उत्तर भारत का मुससिम देखना पसंद नहीं करता था । सूअर पालन के कारण खटिक वर्ग पर मुससिम अतयाचार करने से कभी पीछे नहीं रहे । दक्षिण
भारत और महारा्ट्र में भी झटका मांस के कारण खटिक वर्ग को मुससिमों की प्रताड़ना झेलनी पड़ी ।
मुससिम शासकों के क्रकूर दबाव के बावजूद खटिक वर्ग ने अपना मांस विक्रय का कार्य बंद नहीं किया । परिवर्तन उनहोंने सिर्फ यह किया कि मुससिमों को मांस बेचना बंद कर दिया । गैर मुससिमों के लिए उनहोंने अपना कार्य जारी रखा और अपनी दुकानों पर वह
बोर्ड लगाने लगे , जिस पर लिखा होता था - ' खटिक झटका मीट की दुकान '। झटका शबद को देखकर मुससिमों ने स्वतः उनकी दुकानों पर बंद कर दिया । ऐसी ससथि में सिर्फ मांसाहारी गैर हिनदुओं के लिए मांस का वयापार चलाये रखना उनके लिए कठिन हो गया । इससे उनका मांस वयवसाय प्रभावित हुआ । ऐसे में उनहोंने मांस के साथ-साथ अलग से अनयानय वयवसाय आरमभ किया । इस प्रकार खटिक वर्ग में तो हिससों में विभकि हो गया- एक , मांस का वयापारी और दूसरा , फल-सबिी
का वयापारी । कालांतर में मांस का वयापार भी दो हिससों में बांट गया-एक , बकरा मांस का वयापार और दूसरा था सूअर के मांस का वयापार ।
वर्तमान खटिक वर्ग अपना पैतृक मांस वयापार तो कर रही है , लेकिन उनके सामने हलाल तंत् खड़ा हुआ है । मांस वयापार का कार्य बड़ी संखया में मुससिम कसाई करने लगे हैं । उनके हलाल मांस को मुससिम के साथ ही हिनदू भी क्रय करते हैं । हलाल और झटका दोनों तरह के मांस खाने वाले गैर मुससिम के कारण मुससिमों द्ारा चलायी जाने वाली हलाल मांस का वयवसाय लगातार बढ़ता जा रहा है । सूअर को छोड़कर अनय पशुओं के मांस का वयापर खटिक वर्ग के हाथों से निकल चुका है । सूअर के मांस का वयवसाय खटिक वर्ग कर तो रहा है , लेकिन यह वयवसाय उन्नत और लाभदायक न होने के कारण खटिक वर्ग में धमािंिरण की खतरनाक प्रवृत्ति बड़े आराम से देखी जा सकती है ।
हलाल तंत् के माधयम से देश में मजहबी आर्थिक हितों की पूर्ति की जा रही है । मजहब की आड़ में हलाल प्रक्रिया का पालन करने के कारण उन खटिक वर्ग के लिए रासिे बंद हो रहे हैं । रोजगार के नाम पर भेदभाव होने के साथ ही हलाल प्रमाणपत् के नाम पर उगाही का एक नया जरिया पैदा कर दिया गया है । हलाल वयवसथा के नाम पर इसिामी नियमों का अनुपालन करने और हलाल मांस के काम में बुतपरसिए गैर . मुससिम अर्थात हिनदू खटिक वर्ग को रोज़गार से दूर किया जा रहा है । देखा जाए तो हलाल तंत् को एक भोजन पद्धति से जोड़ कर पूरी समानांतर अर्थवयवसथा के रूप में फैलाया गया है और सरकारी कानूनी बाधयिा के कारण अपना माल बेचने के लिए बाबा रामदेव जैसे कट्टर हिनदू वयवसायी भी हलाल प्रमाणपत् हासिल करने के लिए लाखों रुपए खर्च कर रहे हैं । ऐसे में केंद्र सरकार को यह विचार करना होगा कि हलाल तंत् पर अंकुश किस तरह से लगाया जाए । �
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