eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 49

मनवाने के लिए मुसलमान सामूहिक आरिमण करने से भी पीछे नहीं रहते है और अपनी दंगाई प्रवृहत् के कारण वह हिंदुओं को सदैव आतंकित करने के प्रयास करते हैं । सामूहिक दंगे करना राजनीति में उनका हनणजीि युद्ध कौशल है ।
कांग्ेस नेताओं और गांधी जी के मुशसलम
प्रेम की चिचिा्य करते हुए डॉ आंबेडकर कहते हैं कि गांधी जी अपने पूरे जीवन में कथित हिनदू- मुशसलम एकता के लिए निरर्थक प्रयास करते रहे । वह इसकी सफलता के लिए मुसलमानों की सभी गलतियों एवं दुष्टताओं को आंख बंद करके देखते रहे । साथ ही यह सोचििे रहे कि यही उनिोंने मुसलमानों के द्ारा हिनदुओं पर किए जाने वाले अत्याचारों को अनदेखा कर दिया तो मुसलमान प्रसन्न हो जाएंगे । मुसलमानों की कभी न ख़तम होने वाली मांगों को वह लगातार मानते रहे और अंत में मुशसलम लीग ( जिन्ना ) के हाथो में कोरा चिेक थमा कर बोले कि जिन्ना , मेरे दोसि , मान जाओ , परनिु इतिहास इस बात का साक्ी है कि जिन्ना तथा अनय मुशसलम नेताओं ने गांधी जी का महतव
एक निकृस्ट और अपराधी मुसलमान से भी नीचिे समझा । गांधी जी ने जब खिलाफत आंदोलन को अपना समर्थन दिया तो डॉ आंबेडकर ने इसकी तीखी आलोचिना की । उनिोंने लिखा कि मुसलमानों द्ारा चिलु किया गया खिलाफत आंदोलन को गांधी जी ने इतनी
श्रद्धा और हव्वास के साथ सवीकार किया कि अनेकों लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ । कई प्रमुख लोगों ने गांधी जी से इस प्रकार के आंदोलन से अलग रहने की सलाह भी दी , किनिु गांधी जी इस आंदोलन से अपने आप को अलग नहीं किया और विरोध के तमाम सवरों के बावजूद गांधी जी ने यहां तक कह दिया कि हमें अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी उस लक्य को प्रापि करना है ।
इसी तरह जब असहयोग आंदोलन के प्रारमभ होने पर 31 अगसि 1920 को गांधी जी अपने सभी पदक सरकार को वापस किए और आंदोलन शुरू किया । तब डॉ आंबेडकर ने लिखा कि गांधी जी को उन हिनदुओं की कोई हचिंता नहीं को , जो असहयोग आंदोलन में मुसलमानों के साथ सशममहलि होने के विरोधी थे । गांधी जी के परामर्श सुनने का मुसलमानों का मन नहीं था । अहिंसा के सिद्धांत की पूजा करने के लिए मुशसलमों ने मना कर दिया । वह सवराजय के लिए प्रतीक्ा करने के लिए तैयार नहीं थे । डॉ आंबेडकर कहते हैं कि हिनदू- मुशसलम एकता की प्राशपि के लिए गांधी ने केवल इतना ही नहीं किया , बल्क मुसलमानों द्ारा हिनदुओं के विरुद्ध भीर्ण अपराध किए गए तो उनिोंने कभी भी उनसे उनके अपराधों का लेखा-जोखा नहीं मांगा ।
हिनदू-मुशसलम गठजोड़ की निरर्थकता की चिचिा्य करते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा था कि हिनदू-मुशसलम एकता की निरर्थकता का और ्या कोई दिगदश्यन हो सकता है ? हिनदू- मुशसलम एकता अभी तक कम से कम दृष्टिगोचिर थी , यद्हप वह एक मृगतृ्णा की भांति थी , परनिु आज यह दृष्टि और मशसि्क दोनों से दूर है । यहां तक कि गांधी जी ने भी समभवतः उस कार्य का कार्यानवयन असंभव समझकर उसका परितयाग कर दिया । डॉ आंबेडकर ने हनभजीकता के साथ उन कारणों का विश्लेषण किया , जिनके कारण हिनदू-मुशसलम एकता सवप्न में संभव नहीं हो सकती । डॉ आंबेडकर लिखते है कि अब जब कि यह सवीकार करना आव्यक है कि हिनदू-मुशसलम एकता के प्रयत्
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