eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 48

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कर दी जाती थी ।
1891 की जनगणना में मुसलमान , देश की कुल जनसंखया में केवल 19 प्रतिशत थे , परनिु धीरे-धीरे उनकी मांगें इस प्रकार बढ़ती गयी कि 1940 में वह सभी क्ेत्रों में पचिास प्रतिशत अर्थात हिनदुओं से अधिक प्रतिनिधितव का अधिकार मांगने लगे थे , जिसका अंत देश के बंटिवारे के साथ हुआ । बाबा साहब ने भारत में मुशसलम समाज के द्ारा किए गए राजनीतिक आरिमणों का विसिृि , रिमबद्ध तथा हव्ले्णातमक वरदान किया है । वह कहते है कि मुशसलम समाज में आरिमण करने की यह सवाभाविक प्रवृहत् बहुत पुरानी है और हिनदू इस मामले में बहुत पीछे हैं । यह बहुत आव्यक है कि संक्ेप में ही ्यों न हो , परनिु मुसलमानों के इस राजनीतिक आरिमण का विवेचिन होना चिाहिए । यह बात भी धयान रहे कि इसी के परिणामसवरूप देशभर में दुर्भावना का जो वातावरण बना , उसकी उपेक्ा नहीं की जा सकती है ।
बाबा साहब ने मुसलमानों के राजनीतिक आरिमणों को तीन भागो में बांटिा है : - मुशसलम राजनीतिक मांगों की निरंतर बढ़ने वाली सूचिी , हिनदुओं की कमजोरी का शोर्ण करने की मनोभूमिका और मुसलमानों द्ारा राजनीत में गुंडागदजी करने की मनोभूमिका । बाबा साहब की यह सोचि ततकालीन समय में मुशसलम नेताओं और मुशसलम समाज की एक के बाद एक करके पेश की जाने वाली मांगों और अपनी मांगों को मनवाने के लिए प्रखर दबाव की कूटिनीति के साथ ही मुशसलम समाज की वयवहारिक शस्हियों के कारण बनी थी ।
गोलमेज सममेलन में मुसलमानों द्ारा पेश की गयी मांगों को जब मान लिया गया तो इसे सांप्रदायिक निर्णय के रूप में देखा गया । इस हवर्य का उ्लेख करते हुए डॉ आंबेडकर ने कहा कि गोलमेज सममेलन में उनकी मांगें ्या थी और उनिें ्या प्रदान किया गया , इन बातों का लेखाजोखा समझ लेने के बाद कोई भी वयश्ि यह हवचिार कर सकता है कि मुशसलम मांगों की अंतिम सीमा पहुंचि चिुकी है और 1932
का समझौता अंतिम समझौता है । लेकिन मुसलमान इस पर भी संतुष्ट नहीं है । बाबा साहब कहते है कि मुसलमान अपनी मांगों पर कहा रुकने वाले हैं । मुशसलम अपनी मांगों के माधयम से हिनदू बहुमत को अ्पमत में बदलने का प्रयत् कर रहे हैं , साथ ही वह अनय अ्पसंखयकों के राजनीतिक अधिकारों में भी कटिौती कर रहे हैं । देखा जाए तो मुसलमान हिटिलर की भार्ा बोल रहे हैं और यह दावा कर रहे हैं कि उनका स्ान सूर्य में होना चिाहिए जैसा कि हिटिलर ने जर्मनी में किया था ।
1947 में जब भारत का बंटिवारा हुआ तो मोहिमद अली जिन्ना ने पूवजी भारत के ततकालीन दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल को भ्रमित करके . दलित समाज को मुशसलमों के साथ पाकिसिान में बसने के लिए तैयार कर लिया । डॉ आंबेडकर जो कि पाकिसिान निर्माण के लिए लाए गए प्रसिाव पर सिद्धांत रूप से सहमत हो चिुके थे , ने जोगेंद्र नाथ मंडल को अपने निर्णय पर हवचिार करने के लिए कहा । लेकिन जिन्ना के दिखये सपनों में जीने वाले जोगेंद्र नाथ मंडल ने डॉ अंबडेकर की सलाह पर कोई धयान नहीं दिया । भारत में दलित- मुशसलम एकता के इस प्रयोग के परिणाम से डॉ आंबेडकर आशंकित थे और जो आशंका
उनके मन में थी , वैसा ही हुआ । पाकिसिान बनने के बाद दलित समाज के उन लाखों लोगों ने , जिनिोंने जिन्ना , जोगेंद्र नाथ मंडल और मुशसलम समाज के साथ मिलकर अपनी सामाजिक और आर्थिक शस्हि को सुधारने का सपना देखा था , टिूटि गया । मुशसलम एकता के नाम पर पाकिसिान जाने वाले दलित समाज के लाखों लोग , मुशसलम कट्टरपंथियों के शिकार हुए । बच्ों , बूढ़ों , महिलाओं सहित लाखों लोगों की इसलिए हतया कर दी गयी ्योंकि उनिोंने पाकिसिान जाने के बाद धर्म परिवर्तन से इंकार कर दिया था । इसी तरह अपनी जान बचिाने के डर से लाखों दलितों ने मुशसलम धर्म अपना लिया और जो बचिे वह आज भी मुशसलमों के रहमोकरम पर जी रहे हैं । देखा जाए तो भारत में कथित दलित-मुशसलम ( राजनीतिक ) का यह पहला उदहारण था और इस एकता का परिणाम दुखद रूप में ही सामने आया ।
मुशसलमों की मानसिकता का बारीकी से अधययन करने वाले डॉ आंबेडकर का कहना था कि मुसलमान हिनदुओं की दुर्बलता का शोर्ण करते हैं । हिनदू बहुमत में होते हुए भी सभी शस्हियों में दुर्बल हैं । राजनीतिक रूप से दुर्बल होने के कारण मुसलमान हिनदुओं का शोर्ण करता है । अपनी राजनीतिक मांगों के
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