eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 47

दलित-मुस्लिम गठजोड़ नहीं , राष्ट्रीय एकता आवश्यक
नहीं होना चिाहिए कि किसी भी बात का प्रारंभिक बिंदु भले ही वह निर्णायक न भी हो , भारत की मौलिक एकता है । तब यह एकता ्यों छिन्न- भिन्न की जाये ? ्या केवल इसलिए कि कुछ मुशसलम असंतुष्ट हैं ? इसके टिुकड़े ्यों करते हो , जबकि ऐतिहासिक रूप से यह एक समपूण्य ईकाई है । डॉ आमबेडकर ने देश के विभाजन को कतई सवीकार नहीं किया था और वह हमेशा यही कहते रहे कि भारत को दो रा्ट्रों की जरुरत नहीं है और उनिोंने हमेशा दलित- मुल्सम समाज की राजनीतिक एकता की बजाय रा्ट्रीय सुरक्ा को मजबूत करने पर जोर दिया , जिससे भारत को विदेशी आरिमणों से मुक्ि मिल सके ।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ नहीं , राष्ट्रीय एकता आवश्यक

बाबा साहब भीम राव आंबेडकर का पूरा जीवन रा्ट्र और दीन-हीनों की सेवा के लिए समर्पित था । उनके जीवन का एक ही उद्े्य था कि इस जीवन की समसि वयश्िगत शक्ि और सामथय्य , जो भी मुझको ई्वर ने दिया है , उसे दलितों के उत्ान तथा रा्ट्र के निर्माण में लगा दिया जाए । उनिोंने सभी को सावधान करते हुए कहा कि जो भी अ्पसंखयक भारत में है , संविधान ने उनको बराबर के अधिकार दिए हैं । इसलिए वह भी आप को हर मोर्चे पर रा्ट्रभ्ि भी सिद्ध करें और रा्ट्र की अखंडता
की रखा के लिए पूरे मन से प्रयत्शील रहे । अपने पूरे जीवन में डॉ आंबेडकर भारत में रहने वाले मुशसलमों को शांतिप्रिय और रा्ट्रभ्ि के रूप में जीवन जीने के सनदेश देते रहे , पर उनिोंने कभी भी मुशसलमों के साथ दलितों के राजनीतिक गठजोड़ माने राजनीतिक अवसरवादिता के प्रसिाव को मंजूरी नहीं दी । उनका कहना था कि यह देश भिन्न-भिन्न जाति और पंथों में बांटिा हुआ है । अ्पसंखयकों की सुरक्ा के लिए आव्यक संवैधानिक प्रबंध किए बिना एक संघ सवयं शासित समाज के रूप में नहीं खड़ा हो सकेगा । इस बारे में किसी को कोई आपहत् नहीं हो सकती किनिु अ्पसंखयकों को भी यह धयान में रखना चिाहिए कि आज यद्हप हम भिन्न-भिन्न जाति-पंथों के टिुकड़े में बनते हुए है , फिर भी हमारा लक्य एक संघ अखंड भारत ही है । इस धयेय को बाधा पहुंचिाने वाली कोई भी मांग अ्पसंखयकों द्ारा जाने-अनजाने के नहीं की जानी चिाहिए ।
मुशसलमों के प्रति डॉ आंबेडकर की यह सोचि अचिानक नहीं पैदा हुई थी । ततकालीन समय में मुशसलमों की सोचि , नीतियों और वयवहार को देखने , समझने और मंथन करने के बाद ही उनिें ऐसा लगने लगा था कि भारत के मुसलमान कहने के लिए शांति की बात करते हैं , पर जब मुशसलमों को अपने हितों की हचिंता होती है , तो वह अहिंसा अपनाकर किसी भी सिर पर उतरने के लिए हर समय तैयार रहते हैं । अगर हम धयान दे तो 1885 में कांग्ेस की स्ापना के पश्चात् राजनीतिक सुधारों की प्रहरिया तेज हो गयी थी और अंग्ेजों ने भारत के स्ानीय लोगों को अधिक अधिकार देने का मन बना रहे थे । उस दौरान मुशसलम समाज संघठित होकर अधिक से अधिक अधिकार प्रापि करने के लिए प्रयत्शील होने लगा । इस हालातों को देखकर डॉ आंबेडकर ने कहा कि मुशसलम समाज के इन प्रयासों ने राजनीतिक आरिमणों का सवरुप ग्िण कर लिए । मुसलमान हर बार अपनी मांगों की लमबी सूचिी बनाकर देते थे और उन मांगों को जब सवीकार कर लिया जाता था तो फिर से एक नयी सूचिी पेश
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